प्रमुख सचिव साहब का ग़ुस्सा और लंबी छुट्टी : रिटायर्ड आईपीएस लगा रहे आयोग के अध्यक्ष बनने के लिए दौड़ : “सत्य-असत्य” में उलझे कलेक्टर साहब!

प्रमुख सचिव साहब का ग़ुस्सा और लंबी छुट्टी : रिटायर्ड आईपीएस लगा रहे आयोग के अध्यक्ष बनने के लिए दौड़ : “सत्य-असत्य” में उलझे कलेक्टर साहब!
1 प्रमुख सचिव साहब का ग़ुस्सा और लंबी छुट्टी
सुप्रीम कोर्ट में इस वक्त एक अहम मामला सुनवाई में है। लेकिन इस केस से जुड़े विभाग के बड़े साहब यानी प्रमुख सचिव की गंभीरता पर सवाल उठ रहे हैं। वजह है—सुनवाई के बीच ही साहब लंबी छुट्टी पर अपने गृह राज्य निकल लिए! बताया जा रहा है कि जब साहब ने इस मामले में रिपोर्ट तैयार की थी तो उन्हें बड़े अफसरों ने आश्वासन दिया था कि जल्द ही उन्हें बेहतर और बड़े विभाग की कमान थमा दी जाएगी। लेकिन जब वादा पूरा नहीं हुआ तो साहब ने भी नाराज़गी जताते हुए “छुट्टी का रास्ता चुन लिया। अब ग़ुस्सा होना तो लाजिमी है, लेकिन चर्चा यही है—“साहब, सुनवाई तो पूरी करवा लेते, फिर जाते छुट्टी मनाने…”

2 रिटायर्ड आईपीएस लगा रहे आयोग के अध्यक्ष बनने के लिए दौड़ 
एक आयोग के अध्यक्ष के तौर पर पदस्थ रहे रिटायर्ड सीनियर आईपीएस का कार्यकाल पूरा हो गया है। उनके स्थान पर नए अध्यक्ष की कुर्सी खाली होते ही कई रिटायर्ड आईपीएस सक्रिय हो गए हैं। लेकिन इस दौड़ में सबसे आगे वही साहब बताए जा रहे हैं जिन्होंने कभी डीजीपी बनने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगा डाला था। दिलचस्प यह रहा कि उस वक्त साहब का नाम तीन नामों की पैनल तक में नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने पैनल में शामिल एक बेहद ईमानदार और शांत स्वभाव वाले आईपीएस का नाम कटवाने की भरपूर कोशिश की थी। राजधानी से लेकर देश की राजधानी तक शिकायतें पहुंचाई गईं, मगर नतीजा सिफर रहा। अब वही साहब आयोग के अध्यक्ष बनने के लिए प्रदेश के मुखिया के चक्कर लगा रहे हैं।

3 “सत्य-असत्य” में उलझे कलेक्टर साहब!
देशभर में दशहरे का पर्व धूमधाम से मनाया गया। हर जगह रावण दहन, जश्न और असत्य पर सत्य की जीत के नारे गूंजते रहे। लेकिन हमारे प्रदेश के एक जिले में कलेक्टर साहब का सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा का विषय बन गया। साहब ने अपने आधिकारिक अकाउंट से दशहरे की बधाई दी, मगर ग़लती से लिख डाला—“सत्य पर असत्य की जीत”! बस फिर क्या था… सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी सक्रिय हो गई। मीम बने, कमेंट बरसे और साहब देखते-देखते हिट हो गए। मामला यहीं नहीं रुका। विपक्ष ने भी मौके का फायदा उठाकर सरकार पर तंज़ कसने शुरू कर दिए—“जब कलेक्टर ही असत्य को जीत दिला दें तो फिर बाकी की क्या उम्मीद!” बाद में जांच हुई तो निकला कि पोस्ट साहब ने नहीं, बल्कि जनसंपर्क विभाग के पीआरओ ने लिख डाला था। लेकिन भाई, अकाउंट तो साहब का था—तो किरकिरी भी साहब की ही होनी थी।

4 आईएएस दंपत्ति के साथ बना गजब संयोग
सरकारी गलियारों में आजकल एक युवा आईएएस दंपत्ति की खूब चर्चा हो रही है। वजह भी कम दिलचस्प नहीं है। हुआ यूं कि जिस जिले में कभी साहब कलेक्टर रह चुके थे, अब वहीं उनकी पत्नी को कलेक्टर बना दिया गया है। संयोग कहें या सरकार की योजना—पर कहानी में ट्विस्ट ज़रूर है। याद दिला दें, साहब को एक विवाद के बाद उसी जिले से हटाकर राजधानी बुला लिया गया था। जबकि उस विवाद से उनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। आलाकमान ने भी मान लिया था कि साहब बेगुनाह हैं, लेकिन सोशल मीडिया का दबाव ऐसा था कि सरकार को साहब की विदाई करनी पड़ी। अब उसी जिले की कमान संभालने जा रही हैं उनकी पत्नी, जिनकी ईमानदार और तेज-तर्रार अफसर की पहचान जगजाहिर है। दिलचस्प बात ये है कि दोनों ही दंपत्ति नेतागिरी के दबाव में झुकने वालों में नहीं गिने जाते। चर्चा है कि—“साहब हटे तो मैडम आईं… लगता है जिले का रिश्ता इस परिवार से गहरा ही रहेगा!”

5 “आखिरकार हटे कोयला वाले जिले के कलेक्टर साहब!”
कोयले की खदानों के लिए मशहूर जिले के कलेक्टर साहब आखिरकार अपनी कुर्सी से विदा ले ही लिए। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की इतनी लंबी फेहरिस्त थी कि फाइलें भी थक गईं। बड़े साहब तो कब से इन्हें हटाने की तैयारी में थे, लेकिन हर बार सूची बनती और अंतिम क्षणों में साहब का नाम किसी जादू की तरह गायब हो जाता। लगता था जैसे कुर्सी से इनका कोई स्पेशल कोयला कनेक्शन है! आख़िरकार सरकार को हाल ही में शिकायत मिली कि जिला माइनिंग फंड से हुई खरीदी में साहब ने करोड़ों रुपये का खेल कर दिया। दिलचस्प बात यह कि यह खरीदी आंगनबाड़ियों के लिए की गई थी—अब मासूम बच्चों के नाम पर भी “कोयले की कमाई” कर ली जाए, तो सरकार को कार्रवाई करनी ही थी। साहब को हटाकर साफ सुथरी छवि और तेज-तर्रार, सीधी भर्ती वाले आईएएस अफसर को इस जिले में कलेक्टर बनाकर भेजा गया है।

6 “कलेक्टर बनने पर भी नाराज़ साहब!”
आमतौर पर जब किसी अफसर को कलेक्टर की कुर्सी मिलती है, तो वह सातवें आसमान पर होता है। बधाई संदेशों की बौछार होती है और साहब खुशी-खुशी मुस्कुराते नज़र आते हैं। लेकिन हमारे प्रमोटी आईएएस साहब की कहानी थोड़ी अलग है। पिछले दिनों सरकार ने इन्हें एक जिले का कलेक्टर बनाया। सपनों की पोस्टिंग कहे जाने वाले इस पद पर पहुंचकर भी साहब का पारा सातवें आसमान पर है। हालत ये है कि जो भी बधाई देने फोन करता है, साहब उसे झाड़ पिलाने लगते हैं—बहुत नाराज होने लगते हैं। असल वजह ज़रा दिलचस्प है। पुराने जमाने में ये साहब सरकार के खासमखास हुआ करते थे। उनके एक मैसेज पर न सिर्फ कलेक्टर, बल्कि एसीएस रैंक तक के अफसर बदल जाया करते थे। लेकिन सरकार बदली तो किस्मत भी पलट गई। अर्श से फर्श तक का सफर तय करते हुए साहब सीधे लूप लाइन में पहुंचा दिए गए । अब हालात ये हैं कि राजधानी से पांच सौ किलोमीटर दूर, ढाई तहसील वाले छोटे से जिले का जिम्मा उन्हें थमा दिया गया है। ऐसे में गुस्सा होना तो लाजिमी है। 

7 “ठेके का खेल, मदनानी का मेल!”
प्रदेश के एक बड़े विभाग के निगम में इन दिनों अजब-गजब खेल चल रहा है। खेल के मास्टरमाइंड बताए जा रहे हैं वहां के चीफ इंजीनियर साहब, जिन्हें निगम के एमडी का वरदहस्त पूरी तरह हासिल है। कहानी सुनिए—चीफ इंजीनियर साहब मदनानी की कंपनी पर इतने मेहरबान हैं कि ठेके की शर्तें ही उसी हिसाब से तैयार करवा दीं। अब जब शर्तें कंपनी के मुताबिक हों तो ठेका पक्का किसे मिलना था, ये समझना मुश्किल नहीं। और हुआ भी वही—ठेका मदनानी को ही मिल गया। मगर असली मज़ा तो काम शुरू होने के बाद आया। घटिया क्वालिटी का सामान जमकर इस्तेमाल हो रहा है। निगम के कुछ अफसरों ने जब इसकी शिकायत एमडी साहब से की तो उन्होंने बड़े इत्मीनान से कहा—“देखता हूं…” और मामला चलता कर दिया। अब निगम के अंदर ही अंदर कानाफूसी है कि चीफ इंजीनियर और एमडी दोनों की मदनानी प्रेमकथा विभाग तक पहुंच चुकी है। खबर है कि अफसरों ने पूरा मामला एसीएस तक पहुंचा दिया है, और उधर साहब खासे नाराज़ बताए जा रहे हैं।

8 आईपीएस सस्पेंड होंगे या शुरू होगी डीई
आर्थिक राजधानी में हुए बड़े हादसे की जांच रिपोर्ट आखिरकार मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच गई है। रिपोर्ट तैयार की है एक एसीएस रैंक के अफसर ने, और उसमें साफ लिखा है कि हादसे के पीछे प्रमोटी आईपीएस साहब की बड़ी लापरवाही रही। अब बारी सरकार की है—फैसला होना बाकी है कि साहब सस्पेंड होंगे या फिर विभागीय जांच झेलेंगे। वैसे घटना के तुरंत बाद सरकार ने इन्हें पोस्टिंग से हटाकर मुख्यालय में जमा तो कर ही दिया था। असल मज़ा तो यहां है कि साहब हमेशा से एक कद्दावर मंत्री के बेहद करीबी रहे हैं। नतीजा ये कि पूरी नौकरी उन्होंने लगभग उसी इलाके में काट दी, जहां ये हादसा हुआ। 

9 “कमिश्नरी का सपना… फिर अधूरा!”
प्रदेश की सबसे बड़ी नगर सरकार के मुखिया की कुर्सी पर बैठने का सपना एक प्रमोटी IAS साहब बरसों से देख रहे हैं। एडीएम से लेकर आईएएस अवार्ड तक का पूरा सफर उन्होंने इसी उम्मीद में तय किया कि एक दिन कमिश्नर बनकर सपनों की गाड़ी मंज़िल पर पहुंच जाएगी। कद्दावर मंत्री से नज़दीकियां भी कम नहीं, सो हर बार लगता है कि इस बार तो लॉटरी लग ही जाएगी। लेकिन जैसे ही नई सूची आती है, साहब का सपना धड़ाम से चकनाचूर हो जाता है। इस बार तो पूरा महकमा मान बैठा था कि साहब का सपना पूरा हो ही जाएगा। लेकिन नतीजा उल्टा निकला—कमिश्नर बनने के बजाय साहब को जिले की कलेक्टरशिप से हटाकर सीधा लूप लाइन का टिकट थमा दिया गया। अब खबर है कि साहब बेहद दुखी हैं और एकांत में समय व्यतीत कर रहे हैं।

10 युवा आईएएस के कारण एक सप्ताह में हटे एसडीओ
राजधानी से सटे जिले में एक राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर बड़े सपनों के साथ पहुंचे थे। सोर्स भी उंचे लगाए गए थे और मकसद साफ था—बड़े शहर में एसडीओ बनकर रौब जमाना। लेकिन जैसे ही खबर एक सीनियर आईएएस अफसर के कानों तक पहुंची, खेल ही पलट गया। साहब की जगह उस बड़े शहर का एसडीओ बना दिए गए एक युवा आईएएस। और हमारे अफसर? महज एक हफ़्ते तक एसडीओ की कुर्सी का स्वाद चखने के बाद सीधे लूप लाइन वाली शाखाओं के प्रभार में भेज दिए गए। चूंकि आदेश बेहद ऊँचे स्तर से आया था, लिहाज़ा अब कुछ कर भी नहीं सकते। नतीजा ये कि साहब आजकल बस अपना दुखड़ा सुनाने में ही व्यस्त रहते हैं।




Abhishek Dubey

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Managing Editor

A journalist with more than 15 years of experience in investigative reporting

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