पीएस और भ्रष्ट अफसर के कमीशन की पार्टनरशिप की चर्चा : छह महीने पहले वापस लौट रहे हैं सीनियर आईपीएस : ईएनसी और प्रमोटी आईएएस में विवाद

पीएस और भ्रष्ट अफसर के कमीशन की पार्टनरशिप की चर्चा : छह महीने पहले वापस लौट रहे हैं सीनियर आईपीएस : ईएनसी और प्रमोटी आईएएस में विवाद
1 पीएस और भ्रष्ट अफसर के कमीशन की पार्टनरशिप की चर्चा
मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों एक नई ‘मलाईदार’ कहानी चर्चा में है। बताया जा रहा है कि प्रदेश के एक मलाईदार विभाग के प्रमुख सचिव और एक जिले में पदस्थ भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात अफसर के बीच खूब जमी-जमी है। जिले वाला अफसर खुद को प्रमुख सचिव का “पारिवारिक मित्र” बताकर खूब धमक जमा रहा है। सुनने में आया है कि वह हर महीने दो करोड़ रुपये से ज्यादा की वसूली कर रहा है—और आधा हिस्सा सीधे राजधानी तक पहुंचाने का दावा करता फिर रहा है। दिलचस्प बात ये है कि इस अफसर की जांच भ्रष्टाचार की एजेंसी कर रही है, मगर उसे इस बात की बिल्कुल भी चिंता नहीं। पीएस का वरदहस्त जो सिर पर है! सूत्रों की मानें तो जनाब ने प्रदेश ही नहीं, पड़ोसी राज्यों में भी खूब संपत्ति और होटल कारोबार में निवेश किया है। दो जिलों से भ्रष्टाचार के मामलों में हटाए जाने के बाद भी अब वही पुराने तेवर में हैं। मंत्रालय के गलियारे फिलहाल इसी ‘दो करोड़ी जोड़ी’ की फुसफुसाहटों से गूंज रहे हैं।

2 छह महीने पहले वापस लौट रहे हैं सीनियर आईपीएस
मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों एक सीनियर आईपीएस की “घर वापसी” की चर्चाएं जोरों पर हैं। बताया जा रहा है कि डेप्युटेशन पर गए एडीजी रैंक के ये अफसर तय समय से करीब छह महीने पहले ही प्रदेश लौटने वाले हैं। सूत्रों की मानें तो हाल ही में इनकी मुलाकात प्रदेश के मुखिया जी से हुई थी, जिसमें अफसर ने वापसी की इच्छा जाहिर की और बदले में उन्हें “मनपसंद और प्रभावशाली पोस्टिंग” का भरोसा मिला। कहा जा रहा है कि इसी भरोसे के बाद साहब ने केंद्र सरकार को पत्र भेजकर जल्द रिलीव करने का अनुरोध किया है। अब राजधानी में अटकलों का बाजार गर्म है कि आखिर ये तेज़तर्रार और सख्त मिजाज अफसर किस कुर्सी पर तैनात होंगे। कुछ लोग कह रहे हैं कि इन्हें पुलिस मुख्यालय में अहम जिम्मेदारी मिल सकती है, तो कुछ के मुताबिक, सरकार इन्हें किसी संवेदनशील जोन की पोस्टिंग सौंप सकती है।

3 ईएनसी और प्रमोटी आईएएस में विवाद
राजधानी के मंत्रालय में इन दिनों एक प्रमोटी आईएएस साहब की नई तैनाती को लेकर खूब कानाफूसी चल रही है। बड़े जिले की कलेक्टरी से लौटे साहब को सरकार ने एक मलाईदार विभाग में “लूप लाइन” कही जाने वाली पोस्ट पर भेजा है। मगर लगता है, कलेक्टरी का रुतबा और ठसक अब तक दिलो-दिमाग से उतरी नहीं है। विभाग में कदम रखते ही साहब ने पूरा सिस्टम अपने हिसाब से चलाने की ठान ली। इतना ही नहीं—कहते हैं, अपने ‘कलेक्टर स्टाइल’ में उन्होंने विभाग के ईएनसी से भी सीधा पंगा ले लिया! अब तो हालत ये है कि साहब ईएनसी के चैंबर पर ही कब्जा करने की जुगत में हैं। मगर ईएनसी भी कोई हल्का खिलाड़ी नहीं है। सरकारी गलियारों में उसकी एक मजबूत लॉबी है, जो सीधे ऊपर तक जुड़ी बताई जाती है। खबर है कि इस लॉबी ने विभाग के पीएस से लेकर सत्ता के ऊपरी गलियारों तक साफ संदेश भिजवा दिया है—“साहब को अपनी हद में रहना चाहिए, वरना लूप लाइन से सीधी रवानगी तय मानिए।”

4 सीनियर अफसरों की बैठक में ‘बिना वजह डांट खा गए’ आईपीएस साहब!
राजधानी में पिछले दिनों संसदीय स्टैंडिंग कमेटी की बैठक ने सीनियर अफसरों के पसीने छुड़ा दिए। कमेटी के सदस्य खासतौर पर नाराज थे कि बुलाने के बावजूद न तो प्रदेश के प्रशासनिक मुखिया पहुंचे और न ही पुलिस के मुखिया! कमेटी का गुस्सा तो समझिए, बैठक की शुरुआत ही “असंतोष” के माहौल में हुई। अफसरों की लाइन लगी थी, लेकिन दो सबसे बड़े चेहरों की गैरमौजूदगी ने सारे सीनियर अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ा दीं। पहले तो पुलिस की तरफ से एक सीनियर आईपीएस अफसर को प्रतिनिधि के तौर पर भेजा गया। बेचारे साहब कमेटी के सवालों के निशाने पर आते रहे। हर मुद्दे पर उन्हें ही जवाब देना पड़ा — वो भी बिना तैयारी के! बाद में जब पुलिस मुखिया खुद बैठक में पहुंचे, तब तक माहौल पूरी तरह गर्म हो चुका था। बैठक के बाद सीनियर आईपीएस साहब ने हंसते हुए कहा — “मैं तो बिना वजह ही डांट खा गया! एन वक्त पर बताया गया कि जाना है, पहले से बताते तो तैयारी के साथ जाता।”

5 “मदनानी कनेक्शन” से फंसने वाले हैं सीई साहब!
निगम के गलियारों में इन दिनों एक चीफ इंजीनियर साहब और “मदनानी कनेक्शन” की खूब चर्चा है। बताया जा रहा है कि विभाग के इस सीई को अपने खास मदनानी पर इतनी मेहरबानी दिखाना अब भारी पड़ सकता है। कहानी कुछ यूं है—मदनानी नाम के ठेकेदार को निगम के एक बड़े प्रोजेक्ट का टेंडर मिला था। लेकिन काम में उसने घटिया गुणवत्ता वाला सामान इस्तेमाल कर दिया। सब कुछ सीई साहब की आंखों के सामने हो रहा था, मगर जनाब ने अनजान बने रहना ही बेहतर समझा। आखिर “अपने” पर कैसे कार्रवाई करते! हालांकि, विभाग के बाकी इंजीनियरों को यह मेहरबानी रास नहीं आई। उन्होंने सारा मामला सबूतों सहित विभाग के एसीएस और सरकार के आला अफसरों तक पहुंचा दिया। सुनने में आ रहा है कि करोड़ों रुपये का यह खेल अब उजागर हो चुका है। सूत्र बताते हैं कि फाइलें ऊपर तक पहुंच चुकी हैं और सीई साहब की कुर्सी अब खतरे में है।

6 एमडी साहब ने दलाल को दी “ऑफिशियल एंट्री”!
निगम के गलियारों में इन दिनों एक प्रमोटी आईएएस एमडी साहब के कारनामे की खूब चर्चा है। कहते हैं, साहब ने अपने ‘स्पेशल दलाल’ को अब बाकायदा नौकरी पर रख लिया है! दरअसल, जनाब का यह खासमखास दलाल लंबे समय से साहब के चैंबर के आस-पास मंडराता रहता था। सुबह से शाम तक वहीं डेरा, न कोई पद, न कोई काम—फिर भी हमेशा मौजूद। अब जब लोगों ने सवाल उठाने शुरू किए कि “ये जनाब आखिर हैं कौन?”, तो साहब ने बड़ा ही चालाकी भरा कदम उठाया। बताया जा रहा है कि साहब ने ऑउटसोर्सिंग के जरिए उसी दलाल को निगम में नौकरी दे दी। अब न कोई सवाल, न कोई शक! दलाल का ऑफिस आना-जाना पूरी तरह वैध हो गया। सूत्रों का कहना है कि इस चाल से साहब ने एक तीर से दो निशाने साध लिए हैं—पहला, अब किसी को चैंबर के आसपास दलाल की मौजूदगी पर ऐतराज नहीं होगा; दूसरा, साहब के “क्लाइंट” अब सीधे ऑफिस में आकर उसी के जरिए काम निकलवा सकेंगे।

7 सीजीएम मैडम का न मिला एक्सटेंशन न हुआ मर्जर
राजधानी के मंत्रालय में इन दिनों एक डेप्युटेशन वाली मैडम की नौकरी को लेकर गजब का सस्पेंस बना हुआ है। केन्द्र सरकार के एक बड़े निगम से प्रदेश के एक महत्वपूर्ण विभाग में आईं ये मैडम अपनी ईमानदारी और काम के प्रति समर्पण के लिए जानी जाती हैं। विभाग में उन्होंने कम समय में ही अच्छा प्रभाव बनाया था—शायद यही वजह थी कि उन्हें भरोसा दिया गया था कि या तो एक्सटेंशन मिल जाएगा या फिर उनकी सेवाएं प्रदेश सरकार में मर्ज  कर दी जाएंगी। लेकिन अब कहानी में ट्विस्ट ये है कि मैडम के डेप्युटेशन की अंतिम तारीख पिछले महीने ही निकल गई, और फाइल अब तक केंद्र सरकार को भेजी ही नहीं गई! न कोई आदेश, न कोई स्पष्टीकरण—बस फाइल कहीं मंत्रालय के किसी कोने में अटकी पड़ी है। इस बीच मैडम खुद भी अवकाश पर चली गई हैं, और विभाग में चर्चा जोरों पर है कि क्या वे वापस अपने पुराने निगम में लौटेंगी या सरकार आखिरी समय में कोई “चमत्कारिक फैसला” लेगी।

8 रिटायर्ड इंजीनियर गए पर रसूख अब भी है बरकरार
भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी के छापे के बाद एक रिटायर्ड इंजीनियर की संविदा नौकरी तो जरूर गई, लेकिन लगता है उनका रसूख अब भी वही पुराना है। मामला एक निगम का है, जहां से साहब को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था—पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। बताया जाता है कि जनाब ने अपने बेटे की कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए दस करोड़ का टेंडर ही निकाल दिया था। बेटे की कंपनी को ही टेंडर मिले, इसके लिए शर्तें भी “कस्टम मेड” रखी गईं। लेकिन जैसे ही एजेंसी ने छापा मारा, विभाग ने आनन-फानन में टेंडर निरस्त कर दिया। अब मजेदार मोड़ देखिए—वही टेंडर दोबारा जारी हुआ है, मगर शर्तों में जरा सा भी बदलाव नहीं! ऐसे में विभाग के अंदर ही चर्चा है कि “साहब तो गए, पर सिस्टम पर अब भी उन्हीं का असर है।”

9 पहली बार की विधायक मैडम का ‘मिशन ट्रांसफर’!
राजधानी के सियासी गलियारों में इन दिनों एक नई “ट्रांसफर स्टोरी” की खूब चर्चा है। पहली बार की विधायक बनीं मैडम ने लगता है यह ठान लिया है कि जब तक अपने जिले के एसपी और कलेक्टर दोनों को हटवा नहीं देतीं, तब तक चैन से नहीं बैठेंगी। पिछले हफ्ते ही मैडम ने अपनी नाराजगी दिखाते हुए प्रदेश के एक बड़े शासकीय कार्यक्रम का खुला बहिष्कार कर दिया था। वजह? वही—दोनों अफसरों से बिगड़े रिश्ते। सूत्र बताते हैं कि दो दिन पहले मैडम ने सीधे सरकार के मुखिया जी से मुलाकात कर दोनों अफसरों को हटाने की मांग रख दी। जब उन्हें बताया गया कि मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम चल रहा है, इसलिए अभी कलेक्टर को नहीं हटाया जा सकता, तो मैडम बोलीं — “तो फिर एसपी को ही अभी हटा दीजिए!” मुखिया जी ने मुस्कराते हुए उन्हें फिलहाल “आश्वासन पैक” थमा दिया और कहा कि निर्णय जल्द होगा।

10 एक अफसर के चक्कर में उलटी पड़ गई डीपीसी!
राजधानी के पुलिस गलियारों में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा डीपीसी ड्रामा की है। बताया जा रहा है कि प्रदेश के इतिहास में शायद पहली बार राज्य पुलिस सेवा के अफसरों को आईपीएस अवार्ड देने के लिए बुलाई गई डीपीसी को होने के बाद अचानक निरस्त कर दिया गया। खबर फैलते ही अफसरों में हड़कंप मच गया—सब अपने-अपने स्तर पर कारण तलाशने में जुट गए कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो सरकार को इतना बड़ा कदम उठाना पड़ा! काफी खोजबीन के बाद जो बात सामने आई, उसने सबको चौंका दिया। दरअसल, यह पूरा मामला राज्य पुलिस सेवा के ही एक अफसर से जुड़ा है, जिन पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र का इस्तेमाल करने का आरोप लगा था। पुलिस मुख्यालय के ही एक अफसर ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने बाद में एफआईआर तो रद्द कर दी, लेकिन साथ ही पूरे मामले की पुनः जांच के आदेश दे दिए। बस, यहीं से मामला उलझ गया—और डीपीसी पर लगा ब्रेक! अब रिव्यू डीपीसी होने वाली है।





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