पीएस साहब की छुट्‌टी पर ब्रेक! : तीन करोड़ रुपये की लूट के असली मास्टरमाइंड एसपी और पूर्व एएसपी : आईएएस पत्नी को एक्सटेंशन नहीं दिलवा सके आईएएस पति

पीएस साहब की छुट्‌टी पर ब्रेक! : तीन करोड़ रुपये की लूट के असली मास्टरमाइंड एसपी और पूर्व एएसपी : आईएएस पत्नी को एक्सटेंशन नहीं दिलवा सके आईएएस पति
1 पीएस साहब की छुट्‌टी पर ब्रेक! 
लूप लाइन में विराजमान प्रमुख सचिव साहब की लंबी छुट्‌टी आखिरकार सरकार को पसंद नहीं आई। साहब एक महत्वपूर्ण केस की सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई को बीच में छोड़कर अपने गृह राज्य घूमने निकल गए थे। सरकार को जब यह बात पता चली तो फौरन “वापस बुलाओ उन्हें!” का फरमान जारी हुआ। सूत्रों की मानें तो सरकार ने न सिर्फ उनकी छुट्‌टी खत्म कराई, बल्कि कड़ी नाराज़गी भी जताई है। ऊपर से साफ निर्देश — “मामला बड़ा है, जीत किसी भी कीमत पर चाहिए।वहीं साहब अपने विश्वसनीय लोगों से कह रहे हैं कि मामले में बिल्कुल द नहीं है इसलिए सरकार की हार निश्चित है। इसी वजह से साहब ने इससे दूरी बना रखी है। सुनने में आया है कि उन्हें “जल्द ही बड़ा विभाग मिलेगा” का भरोसा दिया गया था। पर जब वो “जल्द” महीनों में नहीं बदला, तो साहब ने सोचा — चलो थोड़ा सुकून पा लें, और निकल पड़े छुट्टी पर। अब सरकार ने उन्हें सुकून से पहले ही वापस बुला लिया है। 

2 तीन करोड़ रुपये की लूट के असली मास्टरमाइंड एसपी और पूर्व एएसपी
ज़िले में हाल ही में हुए तीन करोड़ रुपये की सनसनीखेज़ लूट के मामले ने पुलिस महकमे में भूचाल ला दिया है। खबर तो ये है कि एक महिला एसडीओपी समेत नौ पुलिसकर्मी तो सस्पेंड होकर बलि का बकरा बन गए, लेकिन असल मास्टरमाइंड तो साहब लोग हैं — एक एसपी और उनके चहेते पूर्व एएसपी! सूत्रों की मानें तो ये दोनों काफी समय से मिलकर कारोबारियों से “ऑपरेशन उगाही” चला रहे थे, और दो बार पहले भी ऐसा खेल कर चुके हैं — बिना किसी को भनक लगे! इस बार भी जैसे ही रुपये बरामद हुए, सबसे पहले खबर गई पूर्व एएसपी साहब को। उन्होंने फौरन फोन लगाया छुट्टी पर गए एसपी को, और फिर शुरू हुआ तीन करोड़ का “वितरण गेम”।  दिलचस्प बात यह कि इस पूर्व एएसपी का ट्रांसफर पुलिस मुख्यालय हो चुका है, लेकिन तीन महीने बीतने के बाद भी साहब ने ज्वॉइन करना जरूरी नहीं समझा। ऊपर से “स्टे मिल गया है” की कहानी पूरे शहर में फैला रखी है। उधर, एसपी का प्रभार देख रहे मौजूदा एएसपी को बड़ी चालाकी से 70 किलोमीटर दूर मर्डर केस में भेज दिया गया, ताकि वो कुछ देख न सकें। लेकिन कहते हैं ना — दीवारों के भी कान होते हैं! जैसे ही मीडिया को भनक लगी, पूरी साजिश का भंडाफोड़ हो गया। अब महकमे में चर्चा गर्म है — “सस्पेंशन तो छोटे वालों का हुआ, बड़े साहब तो अभी भी ‘इनविजिबल मोड’ में हैं!” 

3 आईएएस पत्नी को एक्सटेंशन नहीं दिलवा सके आईएएस पति
मुख्यमंत्री की टीम में पदस्थ एक आईएएस साहब अपनी पत्नी के लिए कुछ “असाधारण” करने की ठान चुके थे — इतिहास रचने का सपना था! पर अफसोस, दिल्ली वालों ने सपना तोड़कर फाइल लौटा दी और वो भी कड़ी टिप्पणी के साथ। दरअसल, मैडम भी आईएएस थीं, और फिलहाल लूप लाइन वाले एक विभाग में डेप्युटेशन पर आराम फरमा रही थीं। रिटायरमेंट नजदीक आया तो साहब को उनकी चिंता सताने लगी — उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय से केंद्र सरकार को पत्र भिजवा दिया कि “मैडम को एक्सटेंशन दे दीजिए, देश को उनकी ज़रूरत है!” अब दिल्ली वाले भी कम नहीं — फाइल पढ़ते ही पूछ बैठे, “भई, ऐसा कौन सा असाधारण काम कर दिया मैडम ने, जो एक्सटेंशन का हक बनता है?”बस, यहीं साहब का सपता टूट कर रह गया!वैसे नियम साफ़ हैं — देश में एक्सटेंशन सिर्फ तीन अफसरों को मिलता है: केबिनेट सेक्रेट्री, होम सेक्रेट्री और चीफ सेक्रेट्री। पर साहब ने “प्यार में नियमों को भी चुनौती” दे डाली। अब न एक्सटेंशन मिला, न तारीफ — मैडम और साहब दोनों का मूड एक्सटेंशन मोड में अटका पड़ा है। महकमे में चटकारे लग रहे हैं —“साहब ने इतिहास नहीं, किस्सा जरूर रच दिया!”

4 “डॉक्टर साहब” का अचानक इस्तीफा, प्रदेश से रवाना! 
आरएसएस के एक दिग्गज पदाधिकारी के खासमखास  रहे “डॉक्टर साहब” ने पिछले दिनों सबको चौंकाते हुए सरकारी संस्थान के मुखिया पद से इस्तीफा दे डाला — और फिर जैसे आए थे वैसे ही चुपचाप प्रदेश छोड़कर निकल भी गए! बताते हैं, डॉक्टर साहब की नियुक्ति पिछली सरकार के जमाने में हुई थी, और जिस संस्थान को उन्होंने संभाला था, वहां हालात आईसीयू में पड़े मरीज जैसे थे। कर्मचारियों को महीनों तक वेतन नहीं, अफसरों का मनोबल ज़मीन पर और फाइलें धूल में! कई बार प्रदेश के “बड़े डॉक्टर साहब” को संस्थान की हालत बताई गई, लेकिन ऊपर से कोई दवाई नहीं आई — न फंड की, न फैसले की। आखिर थक-हारकर डॉक्टर साहब ने खुद ही डिस्चार्ज लेना बेहतर समझा! अब चर्चा गर्म है — “डॉक्टर साहब इलाज करने आए थे और खुद इलाज करवा के चले गए?

5 कोई बहाना नहीं चलेगा मैडम चुनाव ड्यूटी तो करनी होगी
चुनाव ड्यूटी से बचने के लिए अधिकांश अफसर ऐसे-ऐसे बहाने बनाते हैं कि स्कूल जाने वाला कोई छोटी कक्षा का बच्चा भी शर्म खा जाए। अब पीएस स्तर की एक महिला अफसर की ड्यूटी चुनाव में लगाई गई, तो मैडम ने कहा कि वे फिलहाल विदेश यात्रा पर हैं, इसलिए चुनाव कराने नहीं जा सकतीं। लेकिन जब चुनाव आयोग ने इस तर्क को खारिज कर दिया, तो मैडम को अचानक अपने पति की याद आ गई। मैडम ने कहा कि उनके पति का स्वास्थ्य बहुत खराब रहता है, ऐसे में वे प्रदेश छोड़कर चुनाव कराने नहीं जा सकतीं। लेकिन बताया जाता है कि आयोग ने इस तर्क को भी खारिज कर स्पष्ट कह दिया कि, “मैडम, कोई बहाना नहीं चलेगा, आपको चुनाव कराने तो जाना ही पड़ेगा।” मैडम को विधानसभा भी आवंटित कर दी गई है और इसी सप्ताह वहां रिपोर्ट करने के निर्देश जारी कर दिए गए हैं।

6 “गरीब” युवा आईपीएस मैडम की नौकरी पर संकट
प्रदेश की रहने वाली एक युवा आईपीएस अफसर इन दिनों चर्चा में हैं — वजह, उनकी नौकरी पर मंडराता संकट! बताते हैं कि मैडम को केरल कैडर मिला है, लेकिन अब उनके ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट ने पूरा खेल बिगाड़ दिया है। निमाड़ के एक जिले की रहने वाली मैडम ने इकॉनॉमिक वीकर सेक्शन (EWS) का प्रमाणपत्र लगाकर आईपीएस की सीढ़ियां चढ़ी थीं। पर अब किसी “भले नागरिक” ने शिकायत कर दी कि “मैडम का सर्टिफिकेट असली नहीं, फर्जी है।”  बस फिर क्या था — डीओपीटी ने तुरंत एक्शन मोड में आकर प्रदेश सरकार को पत्र भेज दिया: “मैडम का सर्टिफिकेट वेरिफाई कर रिपोर्ट भेजिए।” वैसे कुछ दिन पहले भी यही सर्टिफिकेट मांगा गया था, लेकिन राज्य सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था। अब दोबारा डीओपीटी ने मुख्य सचिव को पत्र ठोंक दिया है, साथ ही उसकी प्रति सीधे मैडम के जिले के डीएम को भी भेज दी गई है।

7 युवा आईएएस साहब की “उम्मीदों की कॉलोनी”! 
कहते हैं — “पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं”, और प्रशासनिक गलियारों में लोग अब यही कह रहे हैं आर्थिक राजधानी में हाल ही में पहुंचे एक युवा आईएएस साहब के बारे में! साहब की एंट्री तो बड़ी स्टाइलिश रही — कॉन्फिडेंस कम नहीं, कॉन्टैक्ट्स उससे भी ज्यादा!  पहले-पहल कोई खास काम नहीं मिला, पर भरोसा पूरा था कि “कॉलोनी सेल” उनके ही हिस्से में आएगा। और इसी भरोसे में साहब होटलों में बिल्डरों से मुलाकातें भी करने लगे — बातचीत में “काम तो हो जाएगा, बस थोड़ा इंतज़ार कीजिए” वाला भरोसा भी देते रहे। लेकिन किस्मत ने इस बार साथ नहीं दिया। जब काम का बंटवारा हुआ, तो साहब के हिस्से में कुछ ऐसा नहीं आया जिससे “भलाई” करते हुए नाम रोशन हो सके। फिर भी उम्मीदें कायम हैं — आखिर “उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है”, और साहब का भी मानना है कि जल्द ही कोई “बड़ा और अच्छा काम” मिल जाएगा...

8 आईपीएस अवार्ड का रास्ता साफ
राज्य पुलिस सेवा के एक अफसर पर किस्मत आखिरकार मेहरबान होती नज़र आ रही है। सरकार के रुख को देखकर लग रहा है कि अगली डीपीसी में साहब को आईपीएस अवार्ड  मिल ही जाएगा। साहब पर आरोप था कि उन्होंने फर्जी जाति प्रमाणपत्र के सहारे नौकरी हासिल की। असल में साहब ओबीसी वर्ग से आते हैं, लेकिन नौकरी के वक्त उन्होंने एसटी का प्रमाणपत्र लगाकर सरकारी कुर्सी पा ली थी। इस पर एफआईआर तक दर्ज हुई और मामला कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने केस तो रद्द कर दिया, लेकिन दोबारा जांच का आदेश भी दे दिया। अब जब फाइल राज्य स्तरीय छानबीन समिति के पास पहुंची, तो वहां एक पुराने सर्कुलर का हवाला देकर साहब को राहत देने की तैयारी जोरों पर है।

9 एसीएस ने दिया फाइव डे वर्किग खत्म करने का प्लान
एक एसीएस साहब अपने हार्ड वर्किंग अंदाज़ के लिए मशहूर हैं — और अब लगता है कि साहब चाहते हैं, पूरा सिस्टम भी उन्हीं की टाइमिंग पर चले!  बड़े साहब के बेहद खास इन एसीएस ने हाल ही में एक “इनोवेटिव आइडिया” दिया — कहा कि अब जब कोरोनाकाल खत्म हो गया है, तो फाइव डे वर्किंग जैसी “लक्ज़री” भी खत्म कर दी जानी चाहिए। यहीं नहीं रुके — साहब ने आगे कहा कि “चुनाव जीतने के उत्साह में जो-जो धार्मिक छुट्टियां बेवजह बांट दी गईं, अब उनको भी विराम दिया जाए।”  बड़े साहब को आइडिया इतना भा गया कि उन्होंने फौरन कमेटी गठित कर दी है। अब बस कमेटी की रिपोर्ट आने की देर है — छुट्टियों का कैलेंडर छोटा और काम का भार बड़ा होने वाला है!

10 “ए-प्लस नोटशीट” वाले प्रोफेसर साहब आखिरकार पहुंचे कुर्सी तक! 
अच्छी नीतियां बनाने वाले उस मशहूर संस्थान में आखिरकार उपाध्यक्ष की नियुक्ति कर दी गई है — वो पद जो पिछले कई महीनों से “खाली पड़ा, पर चर्चा में भरा” था।  और जैसा कि “द नारदमुनि” ने पहले ही फुसफुसाकर बताया था, वही हुआ — उन्हीं प्रोफेसर साहब की ताजपोशी हुई, जिनकी नोटशीट पर डॉक्टर साहब के ऑफिस से “A+” लिखकर भेजी गई थी! वैसे इस ताज तक पहुंचने में दो महीने की मशक्कत और एड़ी-चोटी का पूरा जोर लगाना पड़ा। फाइलें ऊपर-नीचे हुईं, फोन कॉल्स चले, और आखिर में “सही दिशा में लगी मेहनत” रंग लाई। अब दो साल के कार्यकाल के लिए प्रोफेसर साहब की कुर्सी पक्की हो चुकी है।
Abhishek Dubey

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