भिंड का 1500 साल पुराना मिहोनी माता मंदिर जहां प्रतिमा की पीठ की होती है पूजा

भिंड। मध्य प्रदेश के भिंड जिले में पहूज नदी के किनारे बीहड़ों के बीच स्थित मिहोनी वाली माता मंदिर अपनी अनोखी परंपरा और सदियों पुरानी लोकमान्यताओं के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि मंदिर के कुंड में विराजमान माता की मूल प्रतिमा का चेहरा आज तक किसी ने नहीं देखा। यहां श्रद्धालु प्रतिमा की पीठ की पूजा करते हैं और मनोकामना पूरी होने की आस लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं।
भिंड जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर में जवारे चढ़ाने और संतान प्राप्ति की मन्नत के लिए पालना चढ़ाने की परंपरा है। मंदिर के पुजारियों और स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां पीढ़ियों से प्रतिमा की पीठ की ही पूजा होती आ रही है।
गाय की मौत के बाद उलटी हो गई प्रतिमा
मंदिर से जुड़ी लोककथा के अनुसार, करीब 1500 साल पहले एक गाय रोज बीहड़ में बने चबूतरे पर स्थित पत्थर की प्रतिमा पर अपना दूध बहा देती थी। जब गाय के मालिक ने यह देखा तो गुस्से में उसने कुल्हाड़ी से गाय पर हमला कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।
स्थानीय मान्यता है कि इस घटना के तुरंत बाद माता की प्रतिमा अपने आप उलटी हो गई। इसके बाद से प्रतिमा का चेहरा दिखाई नहीं दिया और श्रद्धालुओं ने उसकी पीठ की पूजा शुरू कर दी। हालांकि, इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं हुई है और इसे क्षेत्र में प्रचलित लोकमान्यता के रूप में बताया जाता है।
कुंड में पानी भरने से ऊपर से होती है पूजा
पहले श्रद्धालु सीढ़ियों से कुंड में उतरकर माता की मूल प्रतिमा तक पहुंचते थे और फूल चढ़ाकर पूजा करते थे। पिछले कुछ वर्षों से कुंड में पानी भरा होने के कारण अब ऊपर से ही पूजा-अर्चना की जाती है। करीब पांच साल पहले कुंड के ऊपर एक अन्य प्रतिमा स्थापित की गई। मंदिर परिसर में मां आदिशक्ति शीतला माता की प्रतिमा भी विराजमान है।
चार जिलों की सीमाओं के पास स्थित है मंदिर
मिहोनी माता मंदिर भिंड जिले में स्थित है, जबकि यहां से करीब आधा किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की सीमा शुरू हो जाती है। दतिया के साथ उत्तर प्रदेश के जालौन और झांसी जिले का सीमावर्ती क्षेत्र भी आसपास है। पहूज नदी के बीहड़ों में स्थित होने के कारण यह इलाका कभी डकैतों की आवाजाही के लिए जाना जाता था।
स्थानीय लोगों के अनुसार, फूलन देवी, मलखान सिंह, लुक्का और हरीसिंह कुशवाह जैसे डकैतों के नाम इस क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि डकैत भी माता के प्रति आस्था रखते थे और मंदिर में पूजा करने आते थे, लेकिन परिसर की मर्यादा का ध्यान रखते थे। ये बातें स्थानीय लोगों के अनुभवों और मान्यताओं पर आधारित हैं।
खड़ेश्वरी महाराज ने 11 साल तक की तपस्या
मंदिर से जुड़ी परंपराओं में खड़ेश्वरी महाराज की तपस्या का भी विशेष उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि उन्होंने लगातार 11 साल तक खड़े रहकर साधना की। इसके बाद मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया और श्रद्धालुओं के लिए धर्मशाला तथा पानी की व्यवस्था की गई।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक, उनकी तपस्या के दौरान जमीन से जलधारा निकली, जो आज भी स्वतः बहती है। महाराज के समाधिस्थ होने के बाद उनके उत्तराधिकारी पुरुषोत्तम दास महाराज मंदिर की व्यवस्था संभाल रहे हैं।
चार पीढ़ियों से सेवा कर रहा पुजारी परिवार
मंदिर में चार पीढ़ियों से पूजा-अर्चना कर रहे पंकज शास्त्री के अनुसार, उनके परिवार के सदस्य लंबे समय से माता की सेवा करते आ रहे हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां जवारे और पालना चढ़ाने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी आस्था के चलते दूर-दराज के इलाकों से भी लोग मंदिर पहुंचते हैं।
पुजारी के मुताबिक, करीब 200 साल पहले ग्वालियर के छप्पर वाला परिवार ने मंदिर की पुरानी मढ़ी बनवाई थी। परिवार से जुड़ी एक लोककथा में माता के दरबार में मन्नत मांगने और बेटे के स्वस्थ होने का प्रसंग भी सुनाया जाता है।
मिहोनी वाली माता मंदिर आज भी अपनी अनोखी पूजा परंपरा, बीहड़ों में स्थित होने और पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाओं के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान रखता है।





