आईएएस मैडम के ज्वॉइन करते ही आयोग बना अखाड़ा : सीनियर आईपीएस पर भारी पड़े पूर्व मंत्री : मुख्यमंत्री की बैठक में युवा आईएएस की क्लास

आईएएस मैडम के ज्वॉइन करते ही आयोग बना अखाड़ा : सीनियर आईपीएस पर भारी पड़े पूर्व मंत्री : मुख्यमंत्री की बैठक में युवा आईएएस की क्लास
1 आईएएस मैडम के ज्वॉइन करते ही आयोग बना अखाड़ा
एक प्रमोटी आईएएस मैडम की नई-नई पदस्थापना एक आयोग में हुई क्या, पूरा दफ्तर ही अखाड़ा बन गया। मैडम ज्वॉइन करते ही अवकाश पर चली गईं। नतीजा यह हुआ कि आयोग के अफसर-कर्मचारियों की सैलरी ही अटक गई। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मैडम ने ज्वॉइनिंग के बाद आयोग के अध्यक्ष से औपचारिक सौजन्य भेंट तक नहीं की। बस, यही बात अध्यक्ष साहब को पहले से अखर रही थी। ऊपर से जब कर्मचारियों की सैलरी लटक गई तो उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। अध्यक्ष साहब रिटायर्ड आईपीएस हैं और अपनी तेज-तर्रार व ईमानदार कार्यशैली के लिए मशहूर माने जाते हैं। उन्होंने देर न करते हुए सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर मैडम की शिकायत कर दी। वैसे सत्ता गलियारों में यह चर्चा भी कम दिलचस्प नहीं है कि मैडम का मंत्रालय से आयोग में तबादला भी उनके तत्कालीन पीएस की “काम नहीं करने” वाली शिकायत के बाद ही हुआ था।
2 सीनियर आईपीएस पर भारी पड़े पूर्व मंत्री
विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी एक पूर्व मंत्री का रुतबा कम होता नजर नहीं आ रहा। साहब अब भी शहर के एक आलीशान सरकारी बंगले पर डटे हुए हैं। दिलचस्प बात यह है कि यही बंगला सरकार ने हाल ही में एक सीनियर आईपीएस अफसर को आवंटित कर दिया था। लेकिन नेता जी भी पुराने खिलाड़ी हैं। खबर है कि उन्होंने अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हुए सीधे ऊपरी स्तर पर बात कर ली और बंगला खाली न करने का आग्रह भी कर दिया। फिर क्या था, मामला वहीं ठंडा पड़ गया। नतीजा यह कि जिस बंगले में सीनियर आईपीएस को शिफ्ट होना था, वह अब भी पूर्व मंत्री के कब्जे में है। उधर अफसर साहब को फिलहाल ऑफिसर्स मैस में ही गुजारा करना पड़ रहा है। वैसे यह भी चर्चा है कि सादगी और सीधी छवि वाले इस आईपीएस अफसर ने भी इस मामले में किसी तरह की जोड़-तोड़ करने के बजाय सरकार से दूसरा बंगला देने का ही अनुरोध कर दिया है।
3 मुख्यमंत्री की बैठक में युवा आईएएस की क्लास
एक युवा आईएएस इन दिनों सत्ता के गलियारों में खासे चर्चा में हैं। वजह यह है कि उनकी भ्रष्ट कार्यशैली से पहले ही कई सीनियर अफसर नाराज चल रहे थे, लेकिन अब मुख्यमंत्री भी उनसे खासे खफा बताए जा रहे हैं। बताया जाता है कि हाल ही में मुख्यमंत्री ने उस विभाग की समीक्षा बैठक ली, जहां यह युवा आईएएस पदस्थ हैं। बैठक के दौरान जैसे ही विभागीय कामकाज और फैसलों की परतें खुलीं, मुख्यमंत्री का पारा चढ़ गया। फिर क्या था, भरी बैठक में ही युवा अफसर की जमकर क्लास लग गई। बैठक में मौजूद सीनियर अफसरों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। वे पहले से ही इस आईएएस की कार्यशैली से भली-भांति परिचित थे, इसलिए किसी ने भी उनका बचाव करने की कोशिश नहीं की। दिलचस्प बात यह है कि इतनी फटकार के बाद भी साहब की कार्यशैली में खास बदलाव आता नजर नहीं आ रहा।
4 आईएएस के वकील बेटे की ‘पैरवी’ भारी पड़ गई
एक प्रमोटी आईएएस अफसर अपने वकील बेटे के करियर को लेकर काफी उम्मीदें लगाए बैठे थे। कहते भी थे—“मेरा बेटा बड़ा नाम करेगा।” इसी भरोसे के साथ उन्होंने अपने बेटे का इम्पैनलमेंट एक बड़े विभाग के अधीन आने वाले कॉरपोरेशन में करवा दिया। लेकिन किस्मत ने कुछ और ही मोड़ ले लिया। मामला तब उलझ गया जब एक केस में गलती से कोर्ट ने उस विभाग के प्रमुख सचिव को अवमानना के मामले में पक्षकार बना दिया, जहां आईएएस साहब के बेटे की पैरवी चल रही थी। जबकि मामला किसी दूसरे विभाग का था। अब होनहार वकील बेटे ने भी बिना ज्यादा पड़ताल किए कोर्ट में जवाब दाखिल कर दिया। जब यह बात प्रमुख सचिव तक पहुंची तो वे हैरान रह गए। उन्होंने तुरंत स्थिति स्पष्ट कराते हुए आईएएस के बेटे को कॉरपोरेशन से बाहर का रास्ता दिखा दिया और कोर्ट को भी पूरी वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया। बताया जाता है कि इसी त्वरित कार्रवाई की वजह से प्रमुख सचिव साहब संभावित कोर्ट कार्रवाई से बच गए।
5 रिटायरमेंट से पहले एसीएस को ‘अच्छी पारी’ की तलाश
लंबे समय से लूप लाइन में चल रहे एसीएस स्तर के एक अफसर इन दिनों फिर से मैनस्ट्रीम में आने की जुगत में लगे हुए हैं। साहब की सेवा में अब करीब एक साल ही बाकी बचा है, ऐसे में उनकी कोशिश है कि नौकरी की अंतिम पारी में कुछ जोरदार शॉट लगा दिए जाएं। इसी वजह से इन दिनों वे मलाईदार विभागों में पोस्टिंग के लिए पूरी जोरआजमाइश कर रहे हैं। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि पिछली तबादला सूची में तो साहब का नाम एक बड़े विभाग के मुखिया के तौर पर लगभग फाइनल भी हो गया था। लेकिन ऐन वक्त पर सूची में कैंची चल गई और उनका नाम बाहर हो गया। साहब पिछली सरकार के दौरान मुखिया जी के साथ काम कर चुके हैं। अब उसी पुराने समीकरण के भरोसे वे एक बार फिर अच्छी पोस्टिंग की आस लगाए बैठे हैं।
6 छुट्टियों में भी ‘वर्क मोड’ में बड़े साहब
एक बड़े विभाग के साहब इन दिनों फिर अपने पुराने अंदाज़ में लौट आए हैं। कुछ दिन के अवकाश के बाद जैसे ही वे दफ्तर लौटे, बैठकों का सिलसिला भी उसी रफ्तार से शुरू हो गया। लेकिन इस बार चर्चा का विषय सिर्फ बैठकें नहीं, बल्कि उनका टाइमिंग है। दरअसल साहब छुट्टी के दिनों में भी दफ्तर पहुंचने के लिए मशहूर रहे हैं। इस बार तो उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ते हुए छुट्टी के दिन भी बैठकों का एजेंडा तय करना शुरू कर दिया है। नतीजा यह कि जिन अफसरों ने आराम से छुट्टी बिताने की योजना बनाई थी, उन्हें अब मीटिंग के बहाने दफ्तर का रास्ता नापना पड़ रहा है। अफसरों के बीच मजाक में कहा जा रहा है कि साहब शायद “छुट्टियों के काम का कोटा” भी पूरा करने में लगे हैं। वरना छुट्टी के दिन भी फाइलों और प्रेजेंटेशन के बीच समय बिताने की भला क्या जरूरत थी! हालांकि साहब की सख्त कार्यशैली के सामने कोई खुलकर कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। लिहाजा अफसर मन मारकर छुट्टी खराब करते हुए मीटिंग रूम में हाजिरी लगा रहे हैं।
7 मुख्यमंत्री कार्यालय जाते-जाते पहुंच गए आयोग
एक विभाग से रिटायर होने के बाद से ही एक साहब अपने लिए नई जिम्मेदारी की तलाश में थे। साहब उसी शहर के रहने वाले हैं, जहां से मुखिया जी आते हैं। ऐसे में उन्हें पूरा भरोसा था कि सरकार उनके अनुभव का इस्तेमाल जरूर करेगी। बताया जाता है कि उनकी उम्मीदें बेकार भी नहीं गईं। मुख्यमंत्री कार्यालय में उनकी नियुक्ति की फाइल तक तैयार हो गई थी और बस आदेश जारी होने की ही देर थी। लेकिन ऐन वक्त पर कहानी ने नया मोड़ ले लिया। सूत्रों की मानें तो साहब ने खुद ही हिसाब-किताब लगाना शुरू कर दिया। मुख्यमंत्री कार्यालय में नियुक्ति होती तो कार्यकाल महज एक साल का रहता और हर बार उसे बढ़वाने की मशक्कत अलग करनी पड़ती। ऐसे में साहब ने एक अलग ही चाल चल दी। साहब ने ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेलते हुए अपनी नियुक्ति एक आयोग में करा ली। यहां कार्यकाल भी लंबा है, काम का दबाव भी कम और सुविधाएं भी पूरी। अब सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि रिटायरमेंट के बाद भी साहब ने ऐसी पोस्टिंग हासिल कर ली, जिसे कई लोग नौकरी के दौरान भी तरसते रह जाते हैं।
8 एक आईपीएस अफसर ऐसे भी हैं
इन दिनों सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में अच्छी पोस्टिंग को लेकर जोर-आजमाइश अपने जोरों पर है। अधिकांश आईएएस और आईपीएस अफसर मनचाही कुर्सी के लिए जोड़-तोड़ में लगे हुए हैं। लेकिन इसी भीड़ में एक सीनियर आईपीएस अफसर ऐसे भी हैं, जिनकी रणनीति सबसे अलग बताई जा रही है। चर्चा है कि खुद मुखिया जी उन्हें उनकी पसंदीदा जगह पर भेजना चाहते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि साहब फिलहाल अपनी मौजूदा पोस्टिंग से इतने संतुष्ट हैं कि कहीं और जाने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे। इतना ही नहीं, साहब ने एडीजी स्तर पर केंद्र में अपना इम्पैनलमेंट भी करा लिया है। जानकारों का कहना है कि साहब ने भविष्य के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया है। उन्हें लगता है कि अगर कभी राज्य के राजनीतिक हालात बदले तो वे आसानी से केंद्र का रुख कर सकते हैं। अब सत्ता के गलियारों में लोग इसे साहब की दूरदर्शिता बता रहे हैं। कहते हैं कि जब बाकी अफसर आज की पोस्टिंग के लिए भाग-दौड़ में लगे हैं, तब साहब ने कल की राह पहले ही तैयार कर ली है।
9 एसीएस के फरमान ने उड़ाई अफसरों की नींद
सरकार ने हाल ही में अवैध तरीके से सरकारी बंगले पर कब्जा जमाकर बैठे नेताओं और अफसरों पर लगाम कसने के लिए नया नियम लागू किया है। इसके तहत तय समय सीमा के बाद सरकारी बंगले का किराया कई गुना बढ़ा दिया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि यह सख्ती फिलहाल पूरे प्रदेश में नहीं, बल्कि सिर्फ राजधानी तक ही सीमित रखी गई है। जबकि हकीकत यह है कि सरकारी बंगलों पर “लंबे समय तक कब्जा” रखने की परंपरा सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं, बल्कि प्रदेश के कई शहरों में देखने को मिल जाती है। ऐसे में एक एसीएस स्तर के अफसर ने इस मामले में खुद ही पहल कर दी है। साहब ने स्वत: संज्ञान लेते हुए अपने संभाग में भी इसी तरह की सख्ती लागू करने के निर्देश दे दिए हैं। अब जिन लोगों ने सरकारी बंगले को स्थायी निवास समझ रखा था, उनकी चिंता बढ़ गई है। वैसे साहब का यह तेवर नया नहीं है। जब वे राजधानी में एक प्रशिक्षण देने वाले संस्थान में पदस्थ थे, तब भी उन्होंने अवैध कब्जा जमाकर बैठे कई अफसरों से सरकारी बंगले खाली कराए थे। अब उनके इस कदम से संभाग में भी बंगले वाले कई ‘स्थायी मेहमानों’ की नींद उड़ गई है।
10 कमिश्नर मैडम का फील्ड से मोहभंग
कुछ महीने पहले ही सरकार ने सचिव स्तर की एक आईएएस मैडम को बड़े भरोसे के साथ एक संभाग में कमिश्नर बनाकर भेजा था। माना जा रहा था कि उनके अनुभव और प्रशासनिक समझ का फायदा फील्ड में मिलेगा। लेकिन लगता है कि फील्ड की यह पारी मैडम को ज्यादा रास नहीं आई। सूत्रों की मानें तो कमिश्नर बनने के कुछ ही समय बाद मैडम का मन इस जिम्मेदारी से उचटने लगा। संभाग की लगातार बैठकों, दौरों और फील्ड की भागदौड़ के बीच अब मैडम खुद को ज्यादा सहज महसूस नहीं कर पा रही हैं। बताया जाता है कि सरल और सहज स्वभाव वाली मैडम अब वापस राजधानी लौटना चाहती हैं। इसी के चलते उन्होंने सरकार के सामने अपनी इच्छा भी जाहिर कर दी है। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि मैडम ने साफ तौर पर फील्ड से हटाकर उन्हें राजधानी में किसी जिम्मेदारी देने की गुहार लगाई है।
Abhishek Dubey

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