युवा आईएएस अफसरों को सशर्त प्रमोशन : गुस्सैल एसपी ने 27 पुलिसकर्मियों को थमाए नोटिस : पितृ पक्ष में ज्वॉइनिंग बनी हटने की वजह

1 युवा आईएएस अफसरों को सशर्त प्रमोशन
बड़े साहब की एक खास पहचान है—जो कहते हैं, वो करके दिखाते हैं। कुछ समय पहले साहब ने साफ कहा था कि जो अफसर ट्रेनिंग पर जाने से कतराते हैं, उनकी पूरी कुंडली तैयार की जा रही है। तब कई लोगों ने इसे महज चेतावनी समझा, लेकिन अब साफ हो गया है कि साहब मजाक के मूड में नहीं थे। हाल ही में जब 2017 बैच के 15 अफसरों को जूनियर अकादमिक ग्रेड दिया गया, तो आदेश में एक दिलचस्प ट्विस्ट देखने को मिला। पहली बार यह ग्रेड सशर्त दिया गया है। आदेश में साफ-साफ लिखा है कि यह पदोन्नति इस शर्त पर मान्य होगी कि संबंधित अफसर 2026 में मसूरी में होने वाला मिड करियर ट्रेनिंग प्रोग्राम अनिवार्य रूप से पूरा करेंगे। यानि अब तक जो अफसर ट्रेनिंग के नाम से बचते-बचाते निकल जाते थे, उनके लिए दरवाजे बंद हो चुके हैं। बड़े साहब का संदेश एकदम साफ है—ग्रेड चाहिए तो ट्रेनिंग भी करनी ही होगी। गलियारों में चर्चा है कि आगे भी ऐसे ही सख्त संदेशों की झड़ी लग सकती है।
2 गुस्सैल एसपी ने 27 पुलिसकर्मियों को थमाए नोटिस
मिड करियर ट्रेनिंग से लौटे एक एसपी साहब इन दिनों सातवें आसमान पर हैं। वजह ऐसी है कि जानकर आप भी माथा पीट लेंगे। मामला न अपराध का है, न किसी बड़ी चूक का—पूरा बवाल सिर्फ एक शब्द को लेकर खड़ा हो गया है। दरअसल, ट्रेनिंग पर रवाना होने से पहले साहब ने अपने जिले का प्रभार एक अन्य प्रमोटी आईपीएस को सौंप दिया था। साहब को लगा कि सब कुछ नियम से और सम्मान के साथ चलेगा। लेकिन हुआ उल्टा। साहब की गैरमौजूदगी में जब जिले के पुलिस अधिकारी-कर्मचारी उस आईपीएस से पत्राचार कर रहे थे, तो उन्होंने “पुलिस अधीक्षक प्रभारी” लिखने की जहमत नहीं उठाई। बस फिर क्या था—ट्रेनिंग से लौटते ही साहब का पारा चढ़ गया। नाराजगी इतनी कि एक-दो नहीं, पूरे 27 पुलिस कर्मियों को नोटिस थमा दिया गया। सभी से तीन दिन के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया है। इतना ही नहीं, साहब ने यह चेतावनी भी दे दी है कि जवाब संतोषजनक नहीं हुआ तो कड़ी कार्रवाई तय मानी जाए। अब थानों और दफ्तरों में एक ही चर्चा है—गलती बड़ी हो या छोटी, लेकिन साहब के दरबार में “प्रभारी” शब्द भूलना भारी पड़ गया।
3 पितृ पक्ष में ज्वॉइनिंग बनी हटने की वजह
एक बड़ी घटना के बाद आर्थिक नगरी की मैदानी पोस्टिंग पर तैनात युवा आईएएस अफसर को हटाकर मंत्रालय में अटैच कर दिया गया है। महज चार महीने में ही हुई यह विदाई प्रशासनिक गलियारों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रही है। कुछ लोग इसे गलत समय में हुई जॉइनिंग से भी जोड़कर देख रहे हैं। दरअसल, जब साहब ने यह पद संभाला था, तब पितृ पक्ष यानी कड़े दिन चल रहे थे—ऐसा समय जब परंपरागत तौर पर किसी शुभ कार्य से परहेज किया जाता है। लेकिन साहब ने इन मान्यताओं को नजरअंदाज करते हुए जॉइनिंग कर ली। अब उसी फैसले को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। उधर, साहब अपने रहने के लिए चार एकड़ में फैली सरकारी हवेली को भी भव्य रूप देने में जुटे थे। बताया जा रहा है कि करीब डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से कोठी का कायाकल्प कराया जा रहा था और अगले महीने उसमें शिफ्ट होने की पूरी तैयारी थी। लेकिन इससे पहले ही तबादले की चिट्ठी आ गई। अब प्रशासनिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है—इतनी भव्य सरकारी कोठी अब किसकी किस्मत में आएगी? चर्चाओं का बाजार गर्म है और जवाब फिलहाल वक्त के गर्भ में है।
4 बेचारे प्रमोटी आईपीएस की बढ़ी मुश्किलें
बेचारे एक प्रमोटी आईपीएस अफसर इन दिनों बिना कसूर ही मंत्रालय में बैठे सीनियर आईएएस अफसरों की नाराजगी का शिकार होते नजर आ रहे हैं। सूत्रों की मानें तो इन्हीं अफसरों के इशारे पर पुलिस मुख्यालय जल्द ही साहब को चार्जशीट थमाने की तैयारी में है। मामला दरअसल पिछले साल का है, जब साहब एक छोटे से जिले में एसपी के तौर पर पदस्थ थे। उसी दौरान जिले में संचालित एक अवैध फैक्ट्री में जोरदार बम ब्लास्ट हो गया था। अब मंत्रालय के अफसर सवाल उठा रहे हैं कि साहब के रहते इतनी बड़ी अवैध बम फैक्ट्री आखिर चल कैसे रही थी। हालांकि कहानी का दूसरा पहलू यह है कि इस फैक्ट्री को संचालन की “ढाल” तत्कालीन संभागीय आयुक्त से मिली थी, जिन्होंने बाकायदा स्टे देकर फैक्ट्री को चलने दिया। जानकारों का कहना है कि असल जिम्मेदारी वहीं बनती है, लेकिन निशाने पर फिलहाल एसपी साहब ही हैं। अब सवाल यह है कि चार्जशीट की गाज किस पर गिरती है और असली दोषियों तक जांच पहुँचती भी है या नहीं। फिलहाल तो बेचारे प्रमोटी आईपीएस की किस्मत मंत्रालय की फाइलों में उलझती दिख रही है।
5 सरकार से बेहद दुखी आईएएस लेंगे वीआरएस
लूप लाइन में पदस्थ एक प्रमोटी आईएएस इन दिनों सरकारी सिस्टम से खासे दुखी बताए जा रहे हैं। साहब की मायूसी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके करीबी यहां तक कहने लगे हैं—अगर जल्द कोई अच्छी और मैन स्ट्रीम पोस्टिंग नहीं मिली, तो साहब वीआरएस का रास्ता भी चुन सकते हैं। दरअसल, कुछ समय पहले महाकौशल इलाके के एक जिले में दो दर्जन से ज्यादा बच्चों की मौत का मामला सामने आया था। इस बड़े और संवेदनशील घटनाक्रम के बाद सरकार ने साहब को मैन स्ट्रीम वाले विभाग से हटाकर लूप लाइन में भेज दिया। तभी से साहब के मन में यह बात घर कर गई है कि इस प्रकरण ने उनके करियर पर ऐसा “दाग” लगा दिया है, जिसे धो पाना आसान नहीं। अब हालत यह है कि साहब को लगने लगा है कि मैन स्ट्रीम में वापसी के दरवाजे शायद उनके लिए बंद हो चुके हैं। नतीजा—न काम में पहले जैसा उत्साह बचा है और न ही सिस्टम में भरोसा। अंदरखाने चर्चा है कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो यह निराशा किसी बड़े फैसले की तरफ भी ले जा सकती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि सिस्टम साहब को मनाता है या साहब खुद सिस्टम से विदा ले लेते हैं।
6 युवा आईएएस मैडम के नाम पर साहब की वसूली
मेहनत करने वाले विभाग के एक अफसर इन दिनों संभाग भर में चर्चा का विषय बने हुए हैं। फैक्ट्री संचालक हों, उद्योगपति या फिर होटल मालिक—सब इस साहब से खासे परेशान बताए जा रहे हैं। अंदरखाने आरोप है कि यह अफसर विभाग की आयुक्त, एक युवा आईएएस, के नाम पर जमकर वसूली में जुटा हुआ है। साहब का दावा है कि मैडम ने उनके इलाके में विभाग की पूरी कमान मानो ठेके पर दे दी है, और बदले में हर महीने एक तय रकम ऊपर तक पहुंचानी है। यही वजह है कि वह खुलेआम कहते फिरते हैं—राशि जुटाने के लिए जिस स्तर तक जाना पड़े, जाएंगे, लेकिन वसूली होकर रहेगी। कहानी का तरीका भी बड़ा “सिस्टमेटिक” बताया जाता है। पहले नोटिस थमाया जाता है, फिर कड़ी कार्रवाई का डर दिखाया जाता है। इसके बाद मामला वहीं ठंडे बस्ते में चला जाता है—बशर्ते लेन-देन तय रकम पर हो जाए। दिलचस्प यह है कि जिस विभाग में यह सब चल रहा है, उसके मुखिया की गिनती बेहद ईमानदार अफसरों में होती है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि साहब की यह ‘कमाई मशीन’ कितने दिन तक यूं ही बेरोकटोक चलती रहेगी, और कब ऊपर तक इसकी आंच पहुंचेगी। गॉसिप गलियारों में फिलहाल यही चर्चा गर्म है।
7 मलाईदार पोस्ट के लिए शुरू हुई बोली
सरकार के लिए अहम और मोटा राजस्व जुटाने वाले विभाग में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। विभाग के आईपीएस मुखिया जल्द ही एक साल की स्टडी लीव पर जाने वाले हैं। खबर क्या आई, सिस्टम के गलियारों में हलचल तेज हो गई। इस कुर्सी के खाली होने की आहट मिलते ही मार्केट में बोली लगाने वालों की भीड़ लग गई है। इधर-उधर फोन घनघनाने लगे हैं और उधर नेताओं व सीनियर अफसरों की परिक्रमा शुरू हो चुकी है। कई आईपीएस अफसर खुलकर मैदान में उतर आए हैं—कुछ वे हैं जो पहले भी दावेदारी जता चुके थे, तो कुछ नए चेहरे अचानक रेस में नजर आने लगे हैं। दिलचस्प बात यह है कि हर दावेदार के पास अपनी-अपनी “योग्यता” और “उपलब्धियों” की लंबी फाइल तैयार है। कोई अनुभव का हवाला दे रहा है, तो कोई सरकार के प्रति अपनी निष्ठा गिनवा रहा है। कुल मिलाकर, स्टडी लीव पर जा रहे साहब से ज्यादा चर्चा इस वक्त उनकी खाली होने वाली कुर्सी की है। अब देखना यह है कि इस हाई-प्रोफाइल रेस में बाज़ी कौन मारता है—पुराना खिलाड़ी या कोई नया नाम, जो आखिरी वक्त में सबको चौंका दे।
8 प्रमोटी आईएएस ने आपदा को बदला अवसर में
आर्थिक नगरी में एक आई बड़ी आपदा को एक प्रमोटी आईएएस ने बड़े ही चतुर तरीके से अवसर में बदल दिया है। साहब कुछ ही दिन पहले एक बड़े और मलाईदार विभाग में पदस्थ हुए थे। उम्मीदें ऊंची थीं, सपने भी बड़े थे, लेकिन कुर्सी संभालते ही सारा गणित गड़बड़ा गया। अंदरखाने पता चला कि अधिकारों की असली मलाई तो पहले ही किसी और अधिकारी के हिस्से जा चुकी है। यानी नाम भले ही साहब का हो, लेकिन पॉवर किसी और के हाथ में। बस यहीं से साहब का मन उचट गया और वे मौके की तलाश में रहने लगे। इसी बीच आर्थिक नगरी में आई उस बड़ी आपदा ने साहब को वह पतली गली दिखा दी, जिसकी उन्हें तलाश थी। बिना ज्यादा शोर-शराबे के, साहब ने हालात को अपने पक्ष में मोड़ा और ऐसे निकले कि पीछे मुड़कर देखने की जरूरत ही नहीं पड़ी। गलियारों में चर्चा है कि साहब ने आपदा को बहाना बनाकर सम्मानजनक एक्जिट ले ली, वरना मलाईविहीन पोस्टिंग में ज्यादा दिन टिकना उनके मिजाज में था ही नहीं। अब देखना यह है कि अगली मंजिल पर साहब को असली मलाई मिलती है या फिर कहानी में कोई नया ट्विस्ट आता है।
9 विवादित आईएएस की शहरी क्षेत्र में आमद
ग्रामीण अंचल की कमान संभाल रहे एक युवा आईएएस को अचानक शहरी इलाके में तैनाती मिल जाना इन दिनों सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। साहब की कार्यशैली पहले भी जबरदस्त विवादों में रही है। बताया जाता है कि जब ये अफसर एक धार्मिक नगरी में पदस्थ थे, तब इनके खिलाफ सत्ताधारी दल के नेताओं तक को सड़क पर उतरकर धरना देना पड़ा था। कभी खनन माफियाओं से सांठगांठ के आरोप लगे, तो कभी महंगे वाहन की डिमांड को लेकर नाम उछला। इतना ही नहीं, कुछ दिन पहले केंद्र सरकार ने भी प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर साहब के जाति प्रमाण पत्र को लेकर जानकारी मांग ली है। इसके बावजूद इन्हें शहरी क्षेत्र जैसी अहम पोस्टिंग मिल जाना कई अफसरों को हैरान कर रहा है। वैसे असली तलाश तो सत्ता के गलियारों में उस अफसर की हो रही है, जिसने साहब के इस ‘सुनहरे रिकॉर्ड’ के बावजूद उन्हें शहरी क्षेत्र में लाने की हिम्मत दिखाई। आखिर मेहरबानी किसकी है—यही सवाल इन दिनों सबसे ज्यादा गूंज रहा है।
10 सीनियर आईएएस मैडम की गुहार भी नहीं आई काम
आज के दौर में ज्यादातर अफसर और कर्मचारी रिटायरमेंट से कुछ वक्त पहले ही संविदा या एक्सटेंशन की जुगत में लग जाते हैं। लेकिन पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से रिटायर हुए एक अफसर का किस्सा इससे बिल्कुल उलट निकल आया। बताया जाता है कि विभाग की प्रमुख सीनियर आईएएस मैडम ने खुद इस अफसर से रिटायरमेंट के बाद संविदा पर काम संभालने की गुहार लगाई। मगर साहब ने बेहद शालीन अंदाज में साफ कर दिया कि अब वे सरकारी नौकरी का हिस्सा नहीं बनना चाहते। इस दिलचस्प वाकये का जिक्र खुद मैडम ने साहब की विदाई पार्टी में भी किया। सत्ता और अफसरशाही के गलियारों में यह चर्चा अब जोर पकड़ रही है कि जहां ज्यादातर लोग कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं होते, वहीं इस अफसर ने बिना किसी लालच के सम्मानपूर्वक विदाई को ही प्राथमिकता दी।





