Indore Bhagirathpura Water Crisis: भागीरथपुरा कांड के बाद MP में रोबोट करेंगे पानी-सीवर पाइपलाइन की जांच, 40 रुपए प्रति मीटर होगा खर्च

Indore Bhagirathpura Water Crisis: भागीरथपुरा कांड के बाद MP में रोबोट करेंगे पानी-सीवर पाइपलाइन की जांच, 40 रुपए प्रति मीटर होगा खर्च
इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी की त्रासदी के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने शहरी क्षेत्रों में पेयजल और सीवर नेटवर्क की स्थिति जांचने के लिए रोबोटिक तकनीक का इस्तेमाल करने का फैसला लिया है। नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने प्रदेश के नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर परिषदों को 70 से 900 मिलीमीटर व्यास वाली पानी और सीवर पाइपलाइनों की जांच कराने के निर्देश दिए हैं।
इसके लिए चेन्नई की विशेषज्ञ एजेंसी पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड को सबसे कम बोली यानी L1 के आधार पर एम्पैनल किया गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पाइपलाइन निरीक्षण की दर 40 रुपए प्रति मीटर तय हुई है और इसके लिए एक साल का एग्रीमेंट किया गया है।
भागीरथपुरा के बाद क्यों पड़ी रोबोटिक जांच की जरूरत?
दिसंबर 2025 के आखिर में इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी की वजह से बड़े स्तर पर बीमारी फैली थी। शुरुआती सरकारी और NHRC रिकॉर्ड में दूषित पानी से मौतों और बड़ी संख्या में लोगों के बीमार होने की पुष्टि हुई थी। NHRC ने जनवरी 2026 में मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य के मुख्य सचिव से रिपोर्ट मांगी थी।
बाद में न्यायिक जांच में 36 मौतों की जांच की गई। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक इनमें 24 मौतों को सीवर से दूषित पानी पीने से सीधे जोड़ा गया, जबकि 12 मामलों में दूषित पानी और मौत के बीच निर्णायक संबंध स्थापित नहीं हो सका। न्यायिक जांच में पाइपलाइन बदलने में देरी और शहरी जल नेटवर्क से जुड़े प्रशासनिक पहलुओं पर भी सवाल उठे हैं।
इसी घटना के बाद सरकार का फोकस इस बात पर है कि प्रदेश में ऐसी पाइपलाइन क्रॉसिंग और लीकेज की पहले ही पहचान कर ली जाए, जहां सीवर का पानी पेयजल नेटवर्क को प्रभावित कर सकता है।
प्रदेश में सामने आए हजारों डेंजर क्रॉसिंग पॉइंट
सरकार ने GIS आधारित मैपिंग के जरिए पेयजल और सीवर नेटवर्क के बीच संभावित जोखिम वाले स्थानों की पहचान की है। अब इन जगहों पर केवल कागजी या सतही जांच के बजाय पाइपलाइन के अंदर की वास्तविक स्थिति जानने के लिए रोबोटिक निरीक्षण कराया जाएगा।
इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि पाइपलाइन के भीतर कहीं लीकेज, टूट-फूट, अवैध कनेक्शन या अन्य संरचनात्मक समस्या तो नहीं है।
इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहरों में इस तरह की जांच इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि पुराने और नए पाइपलाइन नेटवर्क कई स्थानों पर एक-दूसरे के आसपास या क्रॉसिंग पर मौजूद हैं।
बिना सड़क खोदे होगी पाइपलाइन की जांच
रोबोटिक निरीक्षण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पाइपलाइन की जांच के लिए हर जगह सड़क खोदने की जरूरत नहीं होगी।
रोबोट को मौजूदा मैनहोल, एयर रिलीज वाल्व या उपलब्ध एक्सेस पॉइंट के जरिए पाइपलाइन के अंदर भेजा जा सकता है। इसके बाद कैमरा और सेंसर पाइपलाइन की अंदरूनी स्थिति का रिकॉर्ड तैयार करेंगे।
इस तकनीक से किसी पाइपलाइन को खोलने या लंबे हिस्से में खुदाई करने से पहले यह पता लगाया जा सकेगा कि वास्तविक समस्या कहां मौजूद है।
CCTV कैमरा और सेंसर से होगी निगरानी
रोबोटिक सिस्टम में हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे और सेंसर लगाए जाते हैं। रोबोट पाइपलाइन के अंदर आगे बढ़ते हुए लगातार वीडियो रिकॉर्ड करता है।
इस रिकॉर्डिंग से विशेषज्ञ पाइपलाइन की दीवारों में मौजूद दरार, छेद, टूट-फूट, लीकेज और अन्य दोषों की पहचान कर सकते हैं।
NITI Aayog के Frontier Tech Network के मुताबिक, चेन्नई की Solinas जैसी कंपनियों के Endobot सिस्टम हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों, सेंसर और GIS तकनीक की मदद से भूमिगत पाइपलाइनों की जांच और डिजिटाइजेशन करते हैं। NITI Aayog के अनुसार ऐसे रोबोट पाइपलाइन के दोषों की पहचान करने के साथ उनकी स्थिति का आकलन भी कर सकते हैं।
₹400 और ₹440 की बोली के मुकाबले ₹40 प्रति मीटर
रोबोटिक पाइपलाइन निरीक्षण के लिए नगरीय प्रशासन विभाग ने ₹1.50 करोड़ की अनुमानित लागत और 365 दिनों की अवधि वाला टेंडर जारी किया था।
इसमें तीन कंपनियों ने बोली लगाई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार दरों में काफी अंतर था:
डिजिटल सर्विलॉन्स: ₹440 प्रति मीटर
फॉर्म डील: ₹400 प्रति मीटर
पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड: ₹40 प्रति मीटर
सबसे कम बोली यानी L1 के आधार पर पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज को एम्पैनल किया गया। अब संबंधित नगरीय निकाय अपनी जरूरत के अनुसार एस्टीमेट तैयार करेंगे और उसके आधार पर वर्क ऑर्डर जारी किए जाएंगे।
70 से 900 MM तक की पाइपलाइनों की होगी जांच
इस योजना के तहत 70 से 900 मिलीमीटर व्यास वाली पानी और सीवर पाइपलाइनों का निरीक्षण किया जाएगा।
इससे छोटे व्यास की वितरण लाइनों से लेकर अपेक्षाकृत बड़ी पाइपलाइनों तक अंदरूनी स्थिति की जांच संभव होगी।
खासकर उन जगहों पर प्राथमिकता दी जा सकती है जहां GIS मैपिंग में पेयजल और सीवर नेटवर्क के बीच संभावित जोखिम वाली क्रॉसिंग सामने आई हैं।
रोबोटिक जांच से क्या होगा फायदा?
पाइपलाइन की सामान्य जांच में कई जगह सड़क की खुदाई करनी पड़ती है। इससे ट्रैफिक, कारोबार और स्थानीय लोगों को परेशानी होती है। रोबोटिक तकनीक में कम खुदाई के साथ पाइपलाइन के अंदर की स्थिति का पता लगाने की कोशिश की जाती है।
NITI Aayog के अनुसार Solinas के Endobot सिस्टम का इस्तेमाल पाइपलाइन की खराबियों जैसे लीकेज और क्रैक की पहचान के लिए किया जाता है। संस्था के मुताबिक ऐसी तकनीक से अनावश्यक खुदाई कम करने और पाइपलाइन की स्थिति के आधार पर मरम्मत या बदलाव की प्राथमिकता तय करने में मदद मिल सकती है।
इसका एक फायदा यह भी है कि पाइपलाइन के अंदर निरीक्षण के दौरान कर्मचारियों को जोखिम वाले हिस्सों में सीधे भेजने की जरूरत कम हो सकती है।
15 से ज्यादा राज्यों में इस्तेमाल हो रही रोबोटिक तकनीक
NITI Aayog के Frontier Tech Network के अनुसार पाइपलाइन निरीक्षण में रोबोटिक तकनीक का इस्तेमाल देश के 15 से अधिक राज्यों में किया जा रहा है। इनमें तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली-NCR प्रमुख क्षेत्र हैं।
NITI Aayog के मुताबिक Solinas के रोबोटिक सिस्टम का इस्तेमाल 15 से अधिक राज्यों और 35 से ज्यादा शहरों में किया जा चुका है। इन सिस्टम का इस्तेमाल भूमिगत पानी, सीवर और ड्रेनेज नेटवर्क की जांच एवं डिजिटाइजेशन के लिए किया जाता है।
MP में पहली बार बड़े स्तर पर इस्तेमाल
मध्यप्रदेश में अब इस तकनीक को शहरी जल और सीवर नेटवर्क की व्यवस्थित जांच के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी है। भागीरथपुरा जैसी घटना के बाद सरकार का जोर केवल खराब पाइपलाइन बदलने पर नहीं, बल्कि जोखिम वाले स्थानों की पहले पहचान करने पर भी है।
हालांकि रोबोटिक निरीक्षण अपने आप में समाधान नहीं है। जांच के बाद सामने आने वाली लीकेज, टूट-फूट या खतरनाक क्रॉसिंग को समय पर ठीक करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। यही प्रक्रिया तय करेगी कि तकनीक से मिले डेटा का इस्तेमाल शहरों की पेयजल सुरक्षा को कितना बेहतर बनाया जा सकता है।
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