आखिर आईएएस मैडम ने अफसरों को बैठक से बाहर क्यों निकाला : सीनियर आईपीएस की पार्टी में हंगामा : इंजीनियर साहब का रिश्वत लेने का अनोखा स्टाइल

1 आखिर आईएएस मैडम ने अफसरों को बैठक से बाहर क्यों निकाला
प्रदेश में गरीब बच्चों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण योजना लंबे समय से बंद पड़ी हुई है। इसके पीछे अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग राय बताई जा रही है। बड़े साहब चाहते हैं कि योजना का संचालन केंद्र सरकार के एक उपक्रम को सौंपा जाए, जबकि सरकार की मंशा है कि वर्तमान में इसे संचालित कर रही निजी एजेंसी ही काम जारी रखे। दूसरी ओर, विभाग की प्रभारी प्रमुख सचिव मैडम का मत है कि योजना के संचालन के लिए नया टेंडर जारी किया जाना चाहिए। इसी बीच हाल ही में विभाग की समीक्षा बैठक के दौरान जब इस योजना पर चर्चा शुरू हुई, तो प्रभारी प्रमुख सचिव मैडम ने अपने विभाग के अधिकारियों सहित अन्य संबंधित अधिकारियों को बैठक कक्ष से बाहर जाने के लिए कह दिया। इस घटना के बाद मंत्रालय के गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या था, जिसके कारण अधिकारियों को चर्चा से दूर रखा गया? क्या मैडम को अपने ही विभाग के अधिकारियों पर भरोसा नहीं था, या फिर इसके पीछे कोई और वजह थी?
2 सीनियर आईपीएस की पार्टी में हंगामा
एडीजी स्तर के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी पिछले दिनों प्रदेश के एक बड़े जिले के दौरे पर पहुंचे। दिनभर निरीक्षण और बैठकों में व्यस्त रहने के बाद शाम को उनके स्वागत में उनके एक पुराने मित्र ने शहर के एक चर्चित और प्रतिष्ठित क्लब में पार्टी का आयोजन किया। इस क्लब में आम लोगों की एंट्री नहीं होती और केवल सदस्यों को ही प्रवेश की अनुमति है। इसी दौरान क्लब का एक सदस्य अपने परिवार के साथ डिनर के लिए वहां पहुंचा। लेकिन उसे बताया गया कि फिलहाल भोजन उपलब्ध नहीं कराया जा सकता, क्योंकि लगभग पूरा स्टाफ एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की मेजबानी और उनकी पार्टी की व्यवस्था में लगा हुआ है। यह सुनते ही सदस्य नाराज हो गया और उसने क्लब प्रबंधन के सामने कड़ा विरोध जताया। देखते ही देखते मामला इतना बढ़ गया कि क्लब में हंगामे की स्थिति बन गई। काफी देर तक चले विवाद के बाद आखिरकार प्रबंधन को व्यवस्था करनी पड़ी और सदस्य के परिवार को भोजन परोसा गया।
3 इंजीनियर साहब का रिश्वत लेने का अनोखा स्टाइल
एक बड़े नगर निगम में पदस्थ एक विवादित इंजीनियर साहब ने कथित तौर पर काम कराने का बड़ा ही अनोखा तरीका विकसित कर रखा है। नगर निगम के सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक पर बैठे होने के कारण जरूरी अनुमतियों से जुड़ी अधिकांश फाइलें आखिरकार उनके पास ही पहुंचती हैं। बताया जाता है कि साहब फाइलों में इतनी आपत्तियां लगा देते हैं कि उन्हें दूर करते-करते आम आवेदक परेशान हो जाए। इसके बाद आवेदक अक्सर किसी परिचित या प्रभावशाली व्यक्ति से सिफारिश करवाकर काम निकलवाने की कोशिश करता है। लेकिन ऐसी सिफारिशों पर साहब नाराज हो जाते हैं और आवेदक को जमकर खरी-खोटी सुना देते हैं। हालांकि, डांट-फटकार के बाद वे एक ‘समाधान’ भी सुझाते हैं। साहब एक वकील साहिबा का नंबर देते हुए सलाह देते हैं कि उनसे संपर्क कर लें, वे पूरी प्रक्रिया समझाकर समस्या का समाधान कर देंगी। फिर आवेदक वकील साहिबा से सलाह लेता है, फीस चुकाता है और कुछ ही समय में उसकी फाइल की राह आसान हो जाती है। दिलचस्प बात यह है कि जिन वकील साहिबा की सलाह से काम बनने की चर्चा है, वे कोई और नहीं बल्कि खुद इंजीनियर साहब की बेटी बताई जाती हैं।
4 युवा आईपीएस को ईमानदारी की मिली सजा
एक युवा आईपीएस अधिकारी बड़े शहर में अपनी सख्त और ईमानदार कार्यशैली के लिए चर्चा में थे। उन्होंने शहर के पब और बार तय समय पर बंद कराने को लेकर सख्ती दिखाई, वे कुछ प्रभावशाली समूहों के निशाने पर भी आ गए थे। इसी बीच एक मीडिया संस्थान से जुड़े मामले में एफआईआर दर्ज हो गई। इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर जूनियर अफसरों तक सभी को थी। बावजूद इसके, कार्रवाई की आंच सबसे ज्यादा युवा आईपीएस अधिकारी पर ही आई। उन्हें रातों-रात पद से हटाकर पुलिस मुख्यालय में अटैच कर दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि मामले की जानकारी रखने वाले कई वरिष्ठ अधिकारियों ने खुद को इससे अलग कर लिया और पूरे घटनाक्रम से पल्ला झाड़ लिया। मंत्रालय और पुलिस महकमे के गलियारों में अब चर्चा इस बात की है कि आखिर पूरे मामले की जिम्मेदारी केवल एक अधिकारी पर ही क्यों तय की गई। वहीं, इस घटनाक्रम में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की भूमिका को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं।
5 कमिश्नर साहब ने एक साथ दो दर्जन तहसीलदारों को थमाए नोटिस
एक प्रमोटी आईएएस अधिकारी, जो इन दिनों एक बड़े संभाग में कमिश्नर के पद पर तैनात हैं, उनका रिटायरमेंट अब ज्यादा दूर नहीं है। ऐसे में साहब ने भी अपनी "बल्लेबाजी" तेज कर दी है। संभाग के अधिकांश जिलों में सीधे भर्ती वाले आईएएस कलेक्टर पदस्थ हैं, जिन पर कमिश्नर साहब का रौब अपेक्षित असर नहीं छोड़ पा रहा है। ऐसे में साहब ने अपना ध्यान अपेक्षाकृत आसान लक्ष्य यानी तहसीलदारों की ओर मोड़ दिया है। शुरुआत में एक-दो तहसीलदारों को नोटिस देकर तलब किया गया। मुलाकात के दौरान उन पर काम में लापरवाही के आरोप लगाए गए, जमकर फटकार लगाई गई और जांच बैठाने तक की चेतावनी दे दी गई। इससे संबंधित अधिकारियों में स्वाभाविक रूप से चिंता बढ़ गई। इसी बीच साहब के रीडर ने सक्रिय भूमिका निभाई। संबंधित तहसीलदारों से संपर्क कर उन्हें भरोसा दिलाया गया कि मामला सुलझाया जा सकता है। बताते हैं कि इसके बाद बातचीत आगे बढ़ी और जैसे ही "समाधान" निकला, साहब की नाराजगी भी अचानक शांत हो गई। अब जब यह फॉर्मूला कारगर साबित होता दिखाई दिया, तो साहब ने एक साथ 24 तहसीलदारों को नोटिस जारी कर तलब कर लिया है।
6 अवैध तरीके से बंगले पर कब्जा जमाए बैठे एसपी साहब
एक जिले के ग्रामीण अंचल में एसपी के तौर पर पदस्थ एक प्रमोटी आईपीएस अधिकारी इन दिनों सरकारी बंगले को लेकर चर्चाओं में हैं। बताया जाता है कि साहब अब भी उस सरकारी बंगले पर कब्जा जमाए हुए हैं, जिसके लिए वे वर्तमान में पात्र नहीं माने जाते। दिलचस्प बात यह है कि जब यही अधिकारी पुलिस की एक विशेष शाखा में एसपी के पद पर पदस्थ थे, तब उन्होंने वहां रह रहे दो युवा आईपीएस अधिकारियों को बंगला खाली करने के नोटिस जारी किए थे। इतना ही नहीं, दोनों अधिकारियों पर नियमों के उल्लंघन का हवाला देते हुए पेनल्टी भी लगा दी गई थी। उस समय साहब का तर्क था कि केवल वही अधिकारी सरकारी आवास का पात्र है, जो संबंधित यूनिट में पदस्थ हो। समय बदला और साहब खुद मुख्यधारा की पुलिस व्यवस्था में आ गए। लेकिन अब भी उनका डेरा उसी पुराने सरकारी बंगले में जमा हुआ है। ऐसे में विभागीय गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि जो अधिकारी कभी नियम-कायदों का हवाला देकर दूसरों को आवास खाली कराने पर आमादा थे, वे खुद उन्हीं नियमों का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं?
7 महापौर और युवा आईएएस के बीच खींचतान अब खुलकर सामने आई
एक नगर निगम में कमिश्नर के पद पर तैनात युवा आईएएस अधिकारी और महापौर के बीच लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। अब तक बंद कमरों तक सीमित रहने वाला यह विवाद सार्वजनिक चर्चाओं का विषय बन गया है। सत्ताधारी दल और आरएसएस के करीबी माने जाने वाले महापौर ने युवा आईएएस पर उनके निर्देशों की अनदेखी करने के आरोप लगाए हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने कमिश्नर की कार्यशैली को लेकर विभाग से लेकर सरकार के उच्च स्तर तक शिकायत भी दर्ज करा दी है। साथ ही उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस कर खुलकर कमिश्नर के खिलाफ बोला है। महापौर का आरोप है कि कमिश्नर को यह विश्वास है कि उनका जल्द ही तबादला होने वाला है, इसलिए वे निगम के कामकाज में अपेक्षित रुचि नहीं ले रहे हैं। यही वजह है कि कई महत्वपूर्ण फैसले और विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। सूत्रों की मानें तो दोनों के बीच मतभेद अब इतने बढ़ चुके हैं कि आपसी संवाद भी लगभग बंद हो गया है। निगम के गलियारों में चर्चा है कि इस टकराव का असर अब प्रशासनिक कामकाज पर भी दिखाई देने लगा है। ऐसे में सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार इस विवाद को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाती है।
8 आईजी साहब मौन व्रत में, डीआईजी संभाल रहे जोन
एक रेंज के आईजी साहब इन दिनों पूरी तरह मौन साधे हुए नजर आ रहे हैं। न वे किसी से मुलाकात करना पसंद करते हैं और न ही फोन कॉल रिसीव करते हैं। हैरानी की बात यह है कि अब तक उन्होंने सरकारी बंगले में भी शिफ्ट नहीं किया है। फिलहाल वे दूसरे रेंज की मेस के एक कमरे में रह रहे हैं। ऑफिस में उनकी मौजूदगी भी बेहद सीमित है। वे कभी-कभार ही कार्यालय आते हैं और तब भी अक्सर शाम ढलने के बाद। ऐसे हालात में पूरे रेंज की जिम्मेदारी लगभग डीआईजी साहब के कंधों पर आ गई है। फील्ड की मॉनिटरिंग से लेकर कार्यालयीन कामकाज तक, अधिकांश जिम्मेदारियां वही संभाल रहे हैं। गौरतलब है कि आईजी साहब सीधे भर्ती होकर आईपीएस बने हैं, जबकि डीआईजी साहब प्रमोटी अधिकारी हैं। इसके बावजूद वर्तमान परिस्थितियों में रेंज के संचालन की कमान व्यावहारिक रूप से डीआईजी साहब ही संभाले हुए हैं।
9 तीन महीने में साहब कर गए जमकर बल्लेबाजी
निर्माण कार्यों को अनुमति देने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था में अध्यक्ष का पद पिछले तीन महीने से खाली पड़ा हुआ है। स्थिति यह है कि इस पद पर नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट भी सरकार को निर्देश दे चुका है, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं हो सका है। इसी बीच संस्था के सचिव ने अनौपचारिक रूप से अध्यक्ष की भूमिका भी संभाल ली थी। दिलचस्प बात यह है कि पूर्व अध्यक्ष एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी थे, जबकि सचिव का पद एक रिटायर्ड आईएफएस अधिकारी के पास था। अध्यक्ष के पद पर नियुक्ति नहीं होने के कारण पिछले कुछ महीनों से संस्था की बागडोर व्यावहारिक रूप से सचिव साहब के हाथों में ही रही। चर्चा है कि इस दौरान साहब ने फैसले लेने में कोई देरी नहीं की। बताया जाता है कि पूर्व अध्यक्ष ने अपने कार्यकाल में जिन फाइलों को विभिन्न कारणों से रोक रखा था, उनमें से अधिकांश का निपटारा पिछले तीन महीनों में कर दिया गया। कई लंबित प्रस्तावों और अनुमतियों पर भी तेजी से निर्णय लिए गए।
10 प्रभारी एसपी बनने के बजाए मुख्यालय हो गए अटैच
एक छोटे से नवगठित जिले में पदस्थ एडिशनल एसपी साहब का लंबे समय से एक खास सपना था। उनकी इच्छा थी कि जिले में नियमित एसपी की पदस्थापना न हो और वे प्रभारी एसपी के रूप में पूरे जिले की कमान संभालें। बताया जाता है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए साहब ने कोई कसर नहीं छोड़ी। सत्ता पक्ष के कई नेताओं से सिफारिशें करवाई गईं और समर्थन में पत्र तक लिखवाए गए। उम्मीद थी कि सरकार जिले में एसपी की नियमित नियुक्ति टाल देगी और कमान उनके हाथों में आ जाएगी। लेकिन सरकार की योजना कुछ और ही थी। तमाम प्रयासों और सिफारिशों के बावजूद जिले में एक नियमित एसपी की पदस्थापना कर दी गई। इसके बाद साहब को अपनी महत्वाकांक्षा पर फिलहाल विराम लगाकर एडिशनल एसपी के रूप में ही काम करना पड़ा। हालांकि कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अब सरकार ने उन्हें जिले से हटाकर मुख्यालय अटैच कर दिया है। ऐसे में प्रभारी एसपी बनने का सपना तो पहले ही अधूरा रह गया था, अब जिले में बने रहने की उम्मीद भी खत्म हो गई है।





