रघुवीर सिंह मीना ST Certificate Case: रिटायर्ड IPS पर FIR, 1984 के प्रमाणपत्र की वैधता जांच के घेरे में

रघुवीर सिंह मीना ST Certificate Case: रिटायर्ड IPS पर FIR, 1984 के प्रमाणपत्र की वैधता जांच के घेरे में
भोपाल/गुना। मध्यप्रदेश के रिटायर्ड IPS अधिकारी रघुवीर सिंह मीना के अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र को लेकर पुलिस मुख्यालय की सतर्कता शाखा ने FIR दर्ज कर जांच शुरू की है। मामला वर्ष 1984 में विदिशा जिले से जारी किए गए ST प्रमाणपत्र से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, मध्यप्रदेश शासन की अनुसूचित जनजाति संदेहास्पद जाति प्रमाणपत्र उच्च स्तरीय छानबीन समिति की जांच में इस प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित किया जा चुका है।
शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
मामले की शिकायत राघौगढ़ निवासी हरवीर सिंह रघुवंशी की ओर से की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि रघुवीर सिंह मीना ने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा में ST वर्ग के अभ्यर्थी के तौर पर आरक्षण का लाभ लिया।
शिकायत के बाद प्रकरण को मध्यप्रदेश शासन की अनुसूचित जनजाति संदेहास्पद जाति प्रमाणपत्र उच्च स्तरीय छानबीन समिति, भोपाल के समक्ष भेजा गया। समिति ने पुराने सरकारी दस्तावेजों, अभिलेखों और संबंधित तथ्यों की जांच की।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, वर्ष 1984 में विदिशा के क्षेत्र संयोजक, आदिम जाति कल्याण विभाग की ओर से रघुवीर सिंह मीना के नाम ST प्रमाणपत्र जारी किया गया था। बाद की जांच में इस प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित किए जाने की बात सामने आई है। प्रमाणपत्र जारी होने की परिस्थितियों और उनके मूल निवासी होने से जुड़े दस्तावेजों की भी जांच की गई थी।
शिक्षक रहते OBC, बाद में ST प्रमाणपत्र का मामला
सतर्कता जांच से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार, पुलिस सेवा में आने से पहले रघुवीर सिंह मीना मध्यप्रदेश में शासकीय शिक्षक के रूप में कार्यरत थे। उस समय उनके द्वारा OBC वर्ग से संबंधित होने का उल्लेख किए जाने की बात सामने आई है।
इसके बाद MPPSC परीक्षा के माध्यम से उनका चयन उप पुलिस अधीक्षक (DSP) पद के लिए हुआ। पुलिस अब इस पूरे रिकॉर्ड की जांच कर रही है कि ST प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किस प्रक्रिया में किया गया और इसके आधार पर उन्हें आरक्षण अथवा नियुक्ति में कोई लाभ मिला या नहीं।
उपलब्ध पुरानी न्यायिक रिपोर्टों के अनुसार, इस जाति प्रमाणपत्र को लेकर विवाद पहले भी सामने आ चुका था। एक रिपोर्ट में बताया गया था कि राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने 16 नवंबर 2015 को प्रमाणपत्र निरस्त किया था और इसके खिलाफ न्यायिक चुनौती भी दी गई थी। हालांकि, बाद की प्रशासनिक स्थिति को लेकर विभिन्न रिपोर्टों में अलग-अलग विवरण मिलते हैं, इसलिए मौजूदा FIR की जांच में रिकॉर्ड की स्थिति महत्वपूर्ण होगी।
पुलिस ने किन बिंदुओं पर शुरू की विवेचना?
पुलिस मुख्यालय भोपाल के थाना सतर्कता में उपलब्ध जांच रिपोर्ट और दस्तावेजों के आधार पर मामला दर्ज किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार FIR में भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B, 167 और 420 तथा SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(q) का उल्लेख किया गया है।
अब विवेचना में मुख्य रूप से इन बिंदुओं की जांच की जा रही है—
  • वर्ष 1984 में ST प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया क्या थी?
  • प्रमाणपत्र जारी करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे?
  • संबंधित अधिकारियों की भूमिका क्या थी?
  • प्रमाणपत्र का इस्तेमाल MPPSC चयन में किस तरह हुआ?
  • ST वर्ग के आधार पर कोई आरक्षण या अन्य सेवा लाभ मिला या नहीं?
  • प्रमाणपत्र की वैधता पर सवाल उठने के बाद संबंधित विभागों और अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की?
पुलिस संबंधित दस्तावेजों, पुराने रिकॉर्ड और लोगों के बयानों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी।
विधानसभा में भी उठ चुका है जाति प्रमाणपत्र का सवाल
रघुवीर सिंह मीना के जाति प्रमाणपत्र को लेकर यह मुद्दा पहले भी मध्यप्रदेश विधानसभा में उठ चुका है। फरवरी 2024 में पूछे गए एक विधानसभा प्रश्न में उनसे संबंधित जाति प्रमाणपत्र, उसके जारी होने वाले जिले और सरकारी सेवा में भर्ती के दौरान उसके इस्तेमाल को लेकर जानकारी मांगी गई थी। सरकार की ओर से उस समय जवाब दिया गया था कि संबंधित जानकारी एकत्रित की जा रही है।
ममता मीना से भी जुड़ा है राजनीतिक संदर्भ
रघुवीर सिंह मीना गुना जिले से ताल्लुक रखते हैं। उनकी पत्नी ममता मीना चांचौड़ा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुकी हैं और जिला पंचायत अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुकी हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान ममता मीना आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी थीं। रघुवीर सिंह मीना का नाम उस दौरान एक अलग पुलिस मामले में भी सामने आया था, हालांकि वह मामला मौजूदा ST प्रमाणपत्र प्रकरण से अलग है।
फिलहाल ST प्रमाणपत्र मामले में FIR दर्ज होने के बाद पुलिस की विवेचना जारी है। FIR और जांच में लगाए गए आरोप अपने आप में अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं हैं। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच के दौरान सामने आने वाले दस्तावेजों, साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
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