सचिव साहब की अजीब डिमांड से परेशान ठेकेदार : सीनियर आईपीएस को केन्द्र में फिर मिल सकती हैं महत्वर्पूण पोस्ट : सूर्य अस्त होते ही साहब हो जाते हैं ऑफिस में मस्त

सचिव साहब की अजीब डिमांड से परेशान ठेकेदार : सीनियर आईपीएस को केन्द्र में फिर मिल सकती हैं महत्वर्पूण पोस्ट : सूर्य अस्त होते ही साहब हो जाते हैं ऑफिस में मस्त
1 सचिव साहब की अजीब डिमांड से परेशान ठेकेदार
राजधानी के गलियारों में इन दिनों एक नए साहब के किस्से खूब तैर रहे हैं। सचिव स्तर के सीधे भर्ती वाले ये आईएएस अभी-अभी एक बड़े और दमदार विभाग में कमिश्नर बनकर विराजमान हुए हैं। लेकिन इनके दरबार में प्रवेश पाने वाले ठेकेदार और कंपनी वाले कुछ ज़्यादा ही हैरान-परेशान दिख रहे हैं। बताते हैं कि काम या टेंडर के सिलसिले में जो भी साहब से मिलने पहुंचता है, उसे एक अनोखी शर्त सुनने को मिलती है— “टेंडर मिल जाएगा… लेकिन उसमें मेरे भाई को 50% पार्टनर बनाना होगा!” बस, इतना सुनते ही कई कारोबारी तो कुर्सी से उछलते हैं और बिना पानी पिए ही दरवाजे का रुख कर लेते हैं। कुछ बहादुरों ने साहब के भाई की प्रोफाइल खंगालने की कोशिश भी की, मगर देखते ही भाग खड़े हुए—पार्टनरशिप की हिम्मत वहीं दम तोड़ गई। और मज़े की बात तो यह है कि यह ‘पार्टनरशिप ऑफर’ सिर्फ एंट्री पास है। असली खेल का कमीशन तो इससे अलग ही है! चर्चा गरम है कि साहब यह ‘फ़ैमिली पैकेज’ कितने दिनों तक चला पाएंगे… या फिर किसी दिन यह खुद ही उनके लिए सिरदर्द बन जाएगा!
2 सीनियर आईपीएस को केन्द्र में फिर मिल सकती हैं महत्वर्पूण पोस्ट
लंबे समय से डेप्युटेशन पर रहकर केंद्र की एक बड़ी कंपनी में सीवीओ की भूमिका निभा रहे साहब का कार्यकाल दिसंबर में खत्म होने वाला है। लेकिन साहब की किस्मत की घड़ी लगता है अभी और भी जोर से टिक-टिक करने वाली है! ख़बर यह है कि साहब डीजी रैंक के लिए इम्पैनल हो चुके हैं। यानी अगला पड़ाव किसी बड़े संस्थान का मुखिया बनना हो सकता है। यदि सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो साहब अपने प्रदेश कॉडर के दूसरे आईपीएस होंगे जो वर्तमान में किसी प्रतिष्ठित संस्थान की कमान संभालेंगे। साहब के पहले अभी कुछ दिन पहले ही एक सीनियर महिला आईपीएस को एक संस्थान का मुखिया बनाया गया है।
3 सूर्य अस्त होते ही साहब हो जाते हैं ऑफिस में मस्त
मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों एक चर्चित प्रमुख सचिव साहब की हालत चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। कुछ महीने पहले इन्हें मंत्रालय की चमक-दमक से निकालकर उस संस्था का मुखिया बना दिया गया, जिसे अफसरों की भाषा में लूप लाइन कहा जाता है। तब से लेकर आज तक साहब का मूड मौसम की तरह बदला-बदला रहता है—ज्यादातर बादलों वाला। बताते हैं कि साहब हर कभी कलेक्टरों की ऑनलाइन कॉन्फ्रेंस बुलाकर अपना ग़ुस्सा उड़ेलते रहते हैं। तड़का लगाने के लिए धमकी भी दे डालते हैं—“देख लीजिए… आपकी शिकायत सामान्य प्रशासन विभाग में कर दूंगा… फिर कुर्सी बचाना मुश्किल हो जाएगा।” लेकिन असली गॉसिप तो शाम के बाद शुरू होता है। साहब के दफ्तर में काम करने वाले बताते हैं कि जैसे ही सूर्य अस्त होता है, साहब का मूड ‘अस्त-व्यस्त’ मोड में आ जाता है। उनके कमरे का माहौल अचानक बदल जाता है और देर रात तक अंदर से ‘धुआं-धुआं’ सी स्थिति बनती रहती है।
4 गुस्सैल युवा आईएएस ने ऑफिस में फेंका लैपटॉप और मोबाइल
मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों एक युवा आईएएस बाबू का गुस्सैल अवतार सबसे चर्चित विषय बना हुआ है। बताते हैं कि साहब एक बड़े और संवेदनशील विभाग में एडिशनल सेक्रेट्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों विभागीय सेक्रेट्री जब बिहार चुनाव कराने गए, तो उनका काम अस्थायी तौर पर एक डिप्टी सेक्रेट्री को सौंप दिया गया। यहीं से शुरू हुई कहानी की गर्मी। साहब को यह बात इतनी नागवार गुज़री कि वे सीधे लंबी छुट्टी पर चले गए। वापस लौटे तो उन्हें उम्मीद थी कि चार्ज उनकी मेज़ पर उनकी चाय की तरह इंतज़ार करता मिलेगा। लेकिन जब पता चला कि फाइलें अब भी डिप्टी सेक्रेट्री की टेबल पर जा रही हैं, तो साहब के तेवर फिर गरमा गए। साहब ने साफ शब्दों में जता दिया—“जूनियर्स के नीचे काम नहीं करेंगे!” और यह बात उन्होंने सिर्फ दफ्तर में नहीं, बल्कि अफसरों के उस व्हाट्सऐप ग्रुप में लिख दी, जिसमें कई सीनियर अधिकारी भी मौजूद हैं। लेकिन क्लाइमैक्स अभी बाकी था— जब गुस्सा काबू से बाहर हुआ, तो साहब ने सरकारी लैपटॉप और अपना निजी मोबाइल ऑफिस में ही फेंककर अपना विरोध दर्ज कर दिया। अब तो मंत्रालय में चर्चा यह है कि साहब का गुस्सा ठंडा होगा या विभाग को अब ‘कूलिंग प्लान’ बनाना पड़ेगा।
5 आईएएस मैडम आखिरकार कब हटेंगी
राजधानी की एक एजेंसी में अंगद की तरह जमी प्रमोटी आईएएस मैडम इन दिनों अपने तेवरों और तौर-तरीकों को लेकर खूब चर्चा में हैं। पांच साल से ज्यादा समय से उसी कुर्सी पर जमीं मैडम ने ऐसा रुतबा कायम कर लिया है, जैसे वे किसी प्रदेश की “चीफ सेक्रेट्री” ही हों! कहते हैं, एजेंसी का पूरा स्टाफ उनके निजी सेवक दल में बदल चुका है। कोई वाहन की व्यवस्था देखता है तो कोई बंगले की—लेकिन जब बात अफसरों के वाहन की आती है, तो मैडम का ‘दरियादिली’ वाला अंदाज़ भी गजब का है! जिसे चाहें, उसे ऐसा वाहन सौंप देती हैं जो किसी कबाड़खाने में भी घुसने लायक मुश्किल से हो। मैडम के निजी आलीशान बंगले की चर्चा भी कम नहीं है—बताया जाता है कि वहां पचास लाख रुपये के बोनसाई पौधे सजे हुए हैं। स्टाफ की माने तो उनकी हुकूमत में सांस लेना भी ‘अनुमति’ से होता है। यहां तक कि उनकी कथित प्रताड़ना से तंग आकर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आत्महत्या का प्रयास भी कर चुका है। फिर भी, मैडम पर न कोई कार्रवाई, न तबादला—कहते हैं, उनके रसूख की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कोई हिला भी नहीं सकता।
6 पीएस ने लिए बीस लाख एडवांस और पार्टनरशिप भी
एक मलाईदार विभाग के मुखिया प्रमुख सचिव ने पिछले दिनों एक ठेकेदार को बुलाकर एक ऑफर दिया। ऑफर यह था कि वो उसके साथ पार्टनरशिप में काम करना चाहते हैं। यह काम पूर्व मुख्यमंत्री के जिले का था। पार्टनरशिप के लिए ठेकेदार जैसे ही तैयार हुआ उन्होंने कमीशन के तौर पर बीस लाख रुपये एडवांस भी मांग लिए। अब विभाग का ही मुखिया जब खुद पार्टनर बन जाए, तो ठेकेदार के लिए उससे बेहतर ‘इंश्योरेंस पॉलिसी’ भला क्या होगी? सो, बिना पलक झपके एडवांस थमा दिया और काम शुरू भी कर दिया। लेकिन मामले में अब नया मोड़ आ गया है। जहां काम चल रहा है उस गांव के लोग उस काम से बेहद परेशान हो गए हैं। उन्होंने पूरे मामले की सूचना सरकार तक पहुंचानी शुरू कर दी है। साथ ही ठेकेदार और साहब की पार्टनरशिप की जानकारी भी उपर तक पहुंचा दी है।
7 रिटायर्ड मुख्य सचिव की प्रदेश में होगी वापसी
अफसरशाही में इन दिनों एक पुरानी और जानी-पहचानी हस्ती की वापसी की चर्चाएं फिर गर्म हो गई हैं। दक्षिण से ताल्लुक रखने वाले एक रिटायर्ड मुख्य सचिव साहब, जो रिटायरमेंट के बाद अपने गृह राज्य लौट गए थे, अब दोबारा प्रदेश की धरती पर कदम रखने वाले हैं। साहब ने प्रदेश इसलिए छोड़ा था क्योंकि वे कानूनी पेंचों की जाल में फंस गए थे। लेकिन अब, जब सारी परेशानियां सुलझ गई हैं, तो साहब ने वापसी की तैयारी कर ली है—वो भी एकदम सोलर पावर मोड में! बताया जा रहा है कि साहब ने यहां एक सोलर एनर्जी कंसल्टेंसी शुरू करने की योजना बनाई है और इसके लिए बाकायदा ऑफिस भी खोल लिया है। बस साहब के आने की देर है, फिर वे अपने नए दफ्तर की कुर्सी पर विराजमान होकर लोगों को सोलर एनर्जी की रोशनी दिखाते नज़र आएंगे।
8 एक अफसर के दो सरकारी बंगले, एक में आत्मा बसती है और एक में साहब
सरकारी अफसरों को एक ही शासकीय बंगला मिल जाए तो यह बहुत बड़ी सरकार की मेहरबानी होती है। लेकिन कुछ अफसर ऐसे भी हैं जो दो-दो बंगले पर कब्जा जमाए बैठे हैं लेकिन किसी सीनियर अफसर की हिम्मत नहीं है जो इन अफसरों से एक बंगला भी खाली करवा ले। अब राज्य प्रशासनिक सेवा के ही एक अफसर को देख लिजिए। वे जब आर्थिक राजधानी में पदस्थ थे तो वहां एक आलीशान बंगला अपने नाम पर आवंटित कर लिया। अब उनका ट्रांसफर आठ महीने पहले आर्थिक राजधानी से सरकार की धार्मिक नगरी में हो गया। वहां जाते ही साहब ने अपना रसूख दिखाते हुए सरकारी बंगला आवंटित करवा लिया। अब साहब के पास दो-दो बंगले हो चुके हैं। लेकिन किसी सीनियर अफसर की इतनी भी हिम्मत नहीं है वो साहब से बंगला खाली करवाना तो दूर उन्हें नोटिस भी दे सके।
9 युवा आईएएस मैडम का लौट आया कांफिडेन्स
लंबे समय से विभागीय हलकों में चर्चा थी कि युवा आईएएस मैडम की कुर्सी कभी भी हिल सकती है। उनके खिलाफ आर्थिक अनियमितताओं की शिकायतों का अंबार लगा हुआ था, और खुद मैडम भी पिछले कुछ हफ्तों से टेंशन मोड ऑन में थीं — ऑफिस में चुपचाप, चेहरा लटकाए, और मुस्कान गायब। लेकिन फिर एक दिन कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि सबकी आंखें खुली रह गईं। मैडम अचानक प्रदेश के मुखिया जी से मिलने पहुंचीं — और वो भी खाली हाथ नहीं, बल्कि एक भारी-भरकम फूलों का बुके लेकर! कहते हैं, वही साइज और स्टाइल वाला बुके, जैसा कॉर्पोरेट जगत के लोग मुखिया जी को भेंट करते हैं। अब देखिए कमाल — उस मुलाकात के बाद मैडम के चेहरे की ग्लो लौट आई है, चाल में कॉन्फिडेंस और मुस्कान में रहस्य! विभाग में लोग चर्चा कर रहे हैं “लगता है बुके का असर कमाल का रहा... मामला जम गया है!”
10 मुक्केबाज़ एएसपी और ‘अटैचमेंट’ की कथा!
सरकार की नगरी में पदस्थ रहे साहब को अचानक हटाकर पुलिस मुख्यालय में सीधे अटैच कर दिया गया है। दिलचस्प यह है कि अब तक उन्हें कोई काम-धाम भी नहीं दिया गया है… यानी फिलहाल साहब फ्रीलांसिंग मोड में हैं। कहानी की शुरुआत साहब की पुरानी आदतों से होती है। बताते हैं कि वे कई दिनों से मनमर्जी मोड में काम कर रहे थे—सीनियर अफसरों को बताए बिना फैसले लेना और फिर उन पर डटकर अमल करना उनकी दिनचर्या बन गई थी। लेकिन असली बवाल तब हुआ जब रात्रि गश्त के दौरान साहब ने एक सरकारी अफसर की गाड़ी रोक ली। थोड़ी ही देर में बात बहस से आगे बढ़कर मुक्केबाज़ी तक पहुंच गई। सीनियर अफसरों ने किसी तरह मामला शांत कराया, लेकिन साहब कहां मानने वाले थे! वे रात में उस अफसर को थाने तक खींच लाए और फिर एफआईआर दर्ज कर दी। बस फिर क्या था—सरकारी अफसर वाले विभाग ने पूरे प्रदेश में आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी। हालात बिगड़ते देख शासन ने बिना देर किए तुरंत एक्शन लिया और साहब को उनके कुर्सी समेत मुख्यालय रवाना कर दिया।
Abhishek Dubey

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Managing Editor

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