MP Employees Protest: 3-8 हजार रुपए वेतन पाने वाले कर्मचारियों का भोपाल में प्रदर्शन, BJP कार्यालय के बाहर धरना

MP Employees Protest: 3-8 हजार रुपए वेतन पाने वाले कर्मचारियों का भोपाल में प्रदर्शन, BJP कार्यालय के बाहर धरना
भोपाल। न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर मध्यप्रदेश के अस्थायी, अंशकालीन, आउटसोर्स और ठेका कर्मचारियों ने सोमवार को भोपाल में प्रदर्शन किया। अलग-अलग विभागों में काम कर रहे कर्मचारी भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय पहुंचे और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा के सामने धरना देकर नारेबाजी की।
कर्मचारियों ने इस आंदोलन को ‘न्यूनतम वेतन दिलाओ उपवास आंदोलन’ नाम दिया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें कई जगहों पर सरकार की ओर से घोषित न्यूनतम मजदूरी से काफी कम भुगतान किया जा रहा है।
BJP कार्यालय के बाहर धरना, पुलिस ने हटाया
प्रदर्शनकारी सुबह बीजेपी प्रदेश कार्यालय के बाहर पहुंचे और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा के सामने बैठकर धरना शुरू कर दिया। कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर नारेबाजी भी की।
इसके बाद मौके पर पुलिस पहुंची और प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाया। पुलिस द्वारा धरना स्थल से हटाए जाने के बाद कर्मचारी रैली के रूप में बोर्ड ऑफिस की ओर रवाना हुए और रास्ते में नारेबाजी करते रहे।
कर्मचारी संगठन के मुताबिक, आंदोलन के जरिए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल को वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती की ओर से की गई न्यूनतम वेतन संबंधी घोषणा की याद दिलाई जा रही है।
12,425 से 16,769 रुपए न्यूनतम मजदूरी का दावा
अस्थायी, आउटसोर्स कर्मचारी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा ने दावा किया कि राज्य सरकार की ओर से घोषित न्यूनतम मजदूरी अलग-अलग श्रेणियों के लिए 12,425 से 16,769 रुपए प्रति माह तक है।
उनका आरोप है कि इसके बावजूद सरकारी विभागों में बड़ी संख्या में कर्मचारियों से महज 3 से 5 हजार रुपए प्रति माह में काम कराया जा रहा है। शर्मा का यह भी दावा है कि औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले कई ठेका श्रमिकों को भी पूरी न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल रही है।
शर्मा के मुताबिक, आंदोलन की पूर्व सूचना भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल को पत्र के माध्यम से दी गई थी।
11 वर्गों के कर्मचारी आंदोलन में शामिल होने का दावा
कर्मचारी संगठन का कहना है कि आंदोलन में करीब 11 अलग-अलग वर्गों के कर्मचारी शामिल हो रहे हैं। इनमें ग्राम पंचायतों के चौकीदार, पंप ऑपरेटर, भृत्य, सफाईकर्मी और लोकल यूथ सर्वेयर शामिल हैं।
संगठन के अनुसार, कुछ कर्मचारियों को महज 2 से 3 हजार रुपए प्रति माह भुगतान किया जा रहा है। शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य विभाग के स्कूलों तथा छात्रावासों में काम करने वाले अंशकालीन और अस्थायी कर्मचारी भी आंदोलन में शामिल होने की बात कही गई है।
वासुदेव शर्मा का आरोप है कि इन कर्मचारियों से कई स्थानों पर 10 से 12 घंटे तक काम लिया जाता है, जबकि उन्हें 4 से 5 हजार रुपए मासिक भुगतान किया जाता है।
अलग-अलग विभागों में कितना भुगतान मिलने का दावा?
कर्मचारी संगठन ने विभिन्न विभागों में काम कर रहे कर्मचारियों के भुगतान को लेकर अलग-अलग आंकड़े बताए हैं।
  • स्कूल, छात्रावास और आयुष विभाग के अंशकालीन/अस्थायी कर्मचारी: 4 से 5 हजार रुपए प्रति माह
  • ग्राम पंचायतों के चौकीदार, पंप ऑपरेटर, भृत्य और सफाईकर्मी: 3 से 4 हजार रुपए
  • स्वास्थ्य विभाग के चतुर्थ श्रेणी आउटसोर्स कर्मचारी: 7 से 8 हजार रुपए
  • राजस्व विभाग के लोक यूथ सर्वेयर: करीब 1 हजार रुपए
  • आदिवासी पंचायतों में पेसा मोबिलाइजर: 4 हजार रुपए
  • कोटवार: 2 से 5 हजार रुपए
  • मध्याह्न भोजन कार्यकर्ता: करीब 4 हजार रुपए
  • मनरेगा के मेट श्रमिक: 2 हजार रुपए से कम
  • योग सहायक एवं प्रशिक्षक: करीब 4,500 रुपए
  • स्वच्छताग्राही: संगठन का दावा है कि कई कर्मचारियों को बिना भुगतान किए हटा दिया गया है।
  • औद्योगिक क्षेत्र, पावर प्लांट और सीमेंट उद्योग के ठेका श्रमिक: संगठन के अनुसार, इन्हें पूरी न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल रही है।
इन आंकड़ों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित विभागों के आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर अलग-अलग स्तर पर की जानी होगी।
BJP प्रदेश अध्यक्ष को पत्र भेजकर उठाए सवाल
आंदोलन से पहले वासुदेव शर्मा की ओर से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल को पत्र भी भेजा गया था। पत्र में दावा किया गया कि मध्यप्रदेश की मेहनतकश जनता वर्ष 2003 से लगातार भाजपा सरकार को समर्थन देती रही है, लेकिन इसके बावजूद अस्थायी और आउटसोर्स कर्मचारियों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
पत्र में आरोप लगाया गया कि पिछले 23 वर्षों में चपरासी तक के पदों पर स्थायी रोजगार के अवसर कम हुए हैं और तृतीय तथा चतुर्थ श्रेणी के कई कामों को अस्थायी एवं आउटसोर्स व्यवस्था के जरिए कराया जा रहा है।
संगठन ने कहा कि इन पदों पर गरीब, मजदूर, दलित, आदिवासी, ओबीसी और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं को रोजगार मिलता था। कर्मचारियों का दावा है कि अस्थायी व्यवस्था में उन्हें रोजगार की स्थिरता और सम्मानजनक वेतन दोनों का अभाव है।
स्थायी रोजगार और न्यूनतम वेतन की मांग
कर्मचारी संगठन का कहना है कि उनका आंदोलन केवल वेतन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। उनकी मांग है कि लंबे समय से काम कर रहे अस्थायी, अंशकालीन, आउटसोर्स और ठेका कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन के साथ रोजगार की सुरक्षा और सेवा से जुड़े अधिकार भी दिए जाएं।
संगठन ने सरकार से विभागवार कर्मचारियों के भुगतान की समीक्षा करने, न्यूनतम मजदूरी लागू करने और लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर स्पष्ट नीति बनाने की मांग की है।
फिलहाल आंदोलन के दौरान कर्मचारियों की ओर से उठाई गई मांगों और सरकार की ओर से इस पर आने वाली प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी।
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