Tendukheda SDM Office: निजी जमीन पर बन रहा था ₹1.35 करोड़ का सरकारी भवन, कलेक्टर ने जांच और वसूली के दिए निर्देश

तेंदूखेड़ा। सरकारी निर्माण कार्यों में जमीन के चयन और दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर तेंदूखेड़ा में गंभीर मामला सामने आया है। यहां करीब ₹1.35 करोड़ की लागत से स्वीकृत एसडीएम कार्यालय भवन का निर्माण निजी भूमि पर शुरू करा दिया गया। मामला जमीन की मालकिन की शिकायत से शुरू होकर जबलपुर हाईकोर्ट तक पहुंचा। इसके बाद जिला प्रशासन ने निर्माण पर रोक लगाने के साथ जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने विवादित भूमि पर किसी भी तरह के निर्माण और हस्तक्षेप पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही निर्माण में खर्च हुई शासकीय राशि की जांच कराने और अधिकारियों की लापरवाही सामने आने पर संबंधित जिम्मेदारों से राशि की वसूली करने के निर्देश दिए गए हैं।
निजी जमीन पर शुरू करा दिया गया सरकारी भवन का निर्माण
मामला तेंदूखेड़ा के खसरा नंबर 170, रकबा 0.2590 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। उपलब्ध राजस्व अभिलेखों के अनुसार जमीन निजी भू-स्वामी के नाम दर्ज बताई गई है। इसी भूमि पर एसडीएम कार्यालय के नए भवन का निर्माण शुरू करा दिया गया।
मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी भवन के लिए जमीन का चयन करते समय स्वामित्व, खसरा-नक्शा, एनओसी और अन्य जरूरी दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया।
आरोप है कि भूमि की वैधानिक स्थिति और जरूरी दस्तावेजों की पर्याप्त जांच किए बिना निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई।
जमीन की मालकिन ने की शिकायत, हाईकोर्ट पहुंचा मामला
भूमि की स्वामिनी ने 3 दिसंबर 2025 को कलेक्टर कार्यालय में शिकायत देकर निजी जमीन पर सरकारी निर्माण कराए जाने पर आपत्ति जताई थी। शिकायत के बाद अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने पर उन्होंने जबलपुर हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने 10 मार्च 2026 को कलेक्टर को मामले का निर्धारित समय-सीमा में निराकरण करने के निर्देश दिए। इसके बाद मामला अवमानना याचिका तक पहुंच गया। अवमानना की कार्रवाई के बाद जिला प्रशासन ने राजस्व प्रकरण में सुनवाई की प्रक्रिया तेज की।
सुनवाई के बाद कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने 12 अगस्त को स्पीकिंग ऑर्डर जारी किया। इसके बाद 27 अगस्त को विवादित भूमि और निर्माण से जुड़े मामले में आगे की कार्रवाई के निर्देश दिए गए।
तत्कालीन PWD अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में
प्रशासन के आदेश के मुताबिक निजी भूमि पर किसी भी प्रकार के निर्माण या हस्तक्षेप पर रोक लगाने के साथ संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं।
मामले में निर्माण प्रक्रिया से जुड़े तत्कालीन कार्यपालन यंत्री, एसडीओ, उपयंत्री/सब-इंजीनियर और अन्य संबंधित पीडब्ल्यूडी अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है।
कलेक्टर ने संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव को भेजने के निर्देश भी दिए हैं।
सरकारी धन के इस्तेमाल की भी होगी जांच
मामला सिर्फ निजी जमीन पर सरकारी भवन का निर्माण शुरू होने तक सीमित नहीं है। निर्माण कार्य में अब तक खर्च हुई शासकीय राशि भी जांच के दायरे में आ गई है।
प्रशासन ने निर्माण पर खर्च हुई राशि का आकलन और जांच कराने के निर्देश दिए हैं। यदि जांच में यह सामने आता है कि अधिकारियों की लापरवाही के कारण शासन को वित्तीय नुकसान हुआ, तो जिम्मेदारी तय कर संबंधित दोषी अधिकारियों से राशि की वसूली की जाएगी।
यानी जांच का एक अहम पहलू यह भी होगा कि निजी भूमि पर निर्माण शुरू कराने के पीछे प्रक्रिया में किस स्तर पर चूक हुई और उस चूक से सरकारी खजाने पर कितना आर्थिक बोझ पड़ा।
PIU की भूमिका पर भी सवाल
इस पूरे मामले में पीआईयू (Project Implementation Unit) की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। सरकारी भवन के निर्माण से पहले निर्माण स्थल, भूमि की उपलब्धता और संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है।
अब जांच में यह स्पष्ट किया जाना है कि निर्माण शुरू होने से पहले भूमि से जुड़े दस्तावेजों की जांच किस अधिकारी ने की थी और निर्माण स्थल को किस आधार पर स्वीकृति दी गई।
अब चिन्हित शासकीय भूमि पर बनेगा एसडीएम कार्यालय
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि तेंदूखेड़ा का नया एसडीएम कार्यालय भवन अब नियमानुसार चिन्हित शासकीय भूमि पर ही बनाया जाएगा। निर्माण कार्य को निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाने और भवन को तय समय-सीमा में पूरा कराने के निर्देश दिए गए हैं।
मामले से संबंधित आदेश की प्रतियां आयुक्त भू-संसाधन, प्रमुख सचिव राजस्व और प्रमुख सचिव लोक निर्माण विभाग को भी भेजी गई हैं।
एक निर्माण ने खड़े किए कई सवाल
तेंदूखेड़ा का यह मामला सरकारी निर्माण कार्यों में भूमि चयन, दस्तावेजों के सत्यापन और विभागीय निगरानी की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। सबसे अहम सवाल यही है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन निजी थी, तो सरकारी भवन का निर्माण शुरू होने से पहले इसका पता क्यों नहीं चला।
फिलहाल विवादित निजी भूमि पर निर्माण रोक दिया गया है। प्रशासन ने संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच, विभागीय कार्रवाई और यदि लापरवाही से सरकारी नुकसान साबित होता है तो शासकीय राशि की वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।





