MP Probation Salary Case: प्रोबेशन में 100% वेतन देने के हाईकोर्ट के आदेश को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

भोपाल। मध्यप्रदेश में सीधी भर्ती से नियुक्त तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि में पूरा वेतन देने के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। सरकार ने अपनी याचिका में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है।
राज्य सरकार का तर्क है कि यदि 12 दिसंबर 2019 से प्रोबेशन पर रहे कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन के हिसाब से बकाया राशि का भुगतान करना पड़ा, तो राज्य के खजाने पर बड़ा अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा।
मध्यप्रदेश में 12 दिसंबर 2019 से सीधी भर्ती वाले कर्मचारियों के लिए प्रोबेशन अवधि के दौरान 70%, 80% और 90% वेतन देने की व्यवस्था लागू थी। हाईकोर्ट ने सितंबर 2026 में इस व्यवस्था को निरस्त करते हुए कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से पूरा वेतन देने का निर्देश दिया था।
सरकार के सामने दोहरा वित्तीय भार
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में राज्य सरकार ने कहा है कि हाईकोर्ट का आदेश लागू होने पर केवल कर्मचारियों का वर्तमान वेतन ही नहीं बढ़ेगा, बल्कि 2019 से अब तक के वेतन अंतर की बकाया राशि का भुगतान भी करना पड़ सकता है।
यानी जिन कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि के दौरान 70%, 80% या 90% वेतन मिला, उन्हें 100% वेतन के आधार पर अंतर की राशि देनी पड़ सकती है।
सरकार का कहना है कि इसका असर भविष्य में होने वाली भर्तियों के बजट पर भी पड़ सकता है। पुराने एरियर और आगे बढ़ने वाले वेतन व्यय को मिलाकर वित्तीय प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है।
पुलिस, पटवारी और शिक्षक भर्ती का हवाला
राज्य सरकार ने अपनी याचिका में पुलिस, पटवारी और शिक्षक जैसी बड़ी भर्तियों का भी उल्लेख किया है। इन विभागों में बड़ी संख्या में सीधी भर्ती से कर्मचारी नियुक्त हुए हैं।
सरकार के मुताबिक यदि इन सभी कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन और पिछली अवधि का अंतर भुगतान करना पड़ा, तो अतिरिक्त वित्तीय भार काफी बढ़ सकता है।
याचिका में यह आशंका भी जताई गई है कि अतिरिक्त वेतन और एरियर का खर्च बढ़ने से पूंजीगत कार्यों और जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए उपलब्ध बजट पर असर पड़ सकता है।
सरकार बोली- सेवा शर्तों के नियम बनाने का अधिकार राज्य को
राज्य सरकार ने अपने पक्ष में संविधान के अनुच्छेद 309 का हवाला दिया है। सरकार का कहना है कि सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से जुड़े नियम बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास है।
सरकार के अनुसार 70-80-90 प्रतिशत वेतन की व्यवस्था अचानक या मनमाने तरीके से लागू नहीं की गई थी। इसे वित्त विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग में प्रक्रिया, परीक्षण और विचार-विमर्श के बाद सक्षम स्तर से मंजूरी मिलने पर लागू किया गया था।
इसी आधार पर सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग की है।
प्रोबेशन को प्रशिक्षण और दक्षता से जोड़ा
सरकार ने अपनी याचिका में प्रोबेशन अवधि को कर्मचारी के प्रशिक्षण और दक्षता के आकलन से भी जोड़ा है। उसका कहना है कि नियुक्ति के शुरुआती दौर में कर्मचारी प्रोबेशन के दौरान प्रशिक्षण और कार्य-दक्षता के मूल्यांकन से गुजरते हैं।
इसी व्यवस्था के आधार पर चरणबद्ध वेतन का प्रावधान रखा गया था। सरकार का तर्क है कि सेवा शर्तों और नीतिगत फैसलों से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित होना चाहिए, जब तक किसी स्पष्ट कानूनी प्रावधान का उल्लंघन न हुआ हो।
हाईकोर्ट पहले भी दे चुका है पूरा वेतन देने का आदेश
प्रोबेशन अवधि में कम वेतन का मामला पहले भी हाईकोर्ट के सामने आ चुका है। 6 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने सीधी भर्ती से नियुक्त कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से पूरा वेतन देने और बकाया राशि का 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ भुगतान करने का आदेश दिया था।
इसके बाद सितंबर 2026 में डबल बेंच ने 12 दिसंबर 2019 से लागू 70-80-90 प्रतिशत वेतन की व्यवस्था को निरस्त करते हुए नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया।
सरकार ने अब इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
अब सुप्रीम कोर्ट के रुख पर नजर
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही से यह तय होगा कि हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक मिलती है या नहीं और आगे इस वेतन व्यवस्था को लेकर क्या कानूनी स्थिति बनती है।
फिलहाल कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ा सवाल 2019 से बकाया वेतन के भुगतान का है। यदि हाईकोर्ट का आदेश लागू रहता है, तो 70-80-90 प्रतिशत वेतन व्यवस्था के तहत भुगतान पा चुके कर्मचारियों के वेतन अंतर का मुद्दा भी सामने आएगा।





