Rao Uday Pratap Singh: तिरंगे के कथित अपमान का परिवाद खारिज, MP-MLA कोर्ट ने कहा- साक्ष्य पर्याप्त नहीं

जबलपुर। मध्य प्रदेश के परिवहन एवं स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को राष्ट्रीय ध्वज के कथित अपमान से जुड़े मामले में एमपी-एमएलए कोर्ट से राहत मिली है। विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट डीपी सूत्रकार की अदालत ने 16 सितंबर को मंत्री के खिलाफ दायर परिवाद खारिज कर दिया। कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों को आगे की आपराधिक कार्रवाई के लिए पर्याप्त नहीं माना। ताजा रिपोर्ट में अदालत के इसी आदेश की जानकारी सामने आई है।
यह मामला 11 अगस्त 2024 को नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा में निकाली गई तिरंगा यात्रा से जुड़ा है। गोटेगांव निवासी कौशल सिलावट ने आरोप लगाया था कि यात्रा के दौरान राव उदय प्रताप सिंह खुली जीप में सवार थे और जीप के बोनट पर रखा राष्ट्रीय ध्वज उनके पैरों को छू रहा था। इसी आधार पर राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई की मांग की गई थी।
क्या था पूरा मामला?
परिवादी के मुताबिक 11 अगस्त 2024 को गाडरवारा से चीचली तक तिरंगा यात्रा निकाली गई थी। आरोप था कि यात्रा के दौरान वाहन के बोनट पर राष्ट्रीय ध्वज इस तरह रखा गया था, जिससे उसकी गरिमा प्रभावित हो रही थी।
परिवादी पक्ष ने अदालत में तस्वीरों, वीडियो, मीडिया रिपोर्ट और अधिकारियों को दी गई शिकायतों को साक्ष्य के तौर पर पेश किया था। मार्च 2026 में इसी परिवाद पर एमपी-एमएलए कोर्ट ने मंत्री को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। अदालत ने उस समय पूछा था कि मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश क्यों न दिया जाए।
कोर्ट ने क्यों खारिज किया परिवाद?
16 सितंबर को मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने परिवाद को खारिज कर दिया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने साक्ष्यों की पर्याप्तता पर सवाल उठाते हुए कहा कि पेश की गई तस्वीर में वाहन का नंबर स्पष्ट दिखाई नहीं देता।
अदालत के अनुसार यह भी पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं हुआ कि जिस वाहन पर तिरंगा रखा गया था, वह सरकारी वाहन या मंत्री का निजी वाहन था। साथ ही ऐसा कोई पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आया, जिससे यह स्थापित हो कि राष्ट्रीय ध्वज मंत्री के निर्देश पर वाहन पर रखा गया था।
इन्हीं आधारों पर अदालत ने परिवाद के आधार पर आगे कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया।
राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम में क्या प्रावधान है?
परिवादी ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2 का हवाला देते हुए कार्रवाई की मांग की थी। परिवादी पक्ष का कहना था कि वाहन पर राष्ट्रीय ध्वज को इस तरह रखना, जिससे उसकी गरिमा प्रभावित हो, कानून के प्रावधानों के दायरे में आता है।
परिवादी ने इसी आधार पर इसे संज्ञेय अपराध बताते हुए पुलिस से एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। संबंधित प्रावधान में दोष सिद्ध होने पर तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
हालांकि, इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों को आगे की कार्रवाई के लिए पर्याप्त नहीं माना और परिवाद खारिज कर दिया।
पुलिस पर भी लगाए गए थे आरोप
परिवादी कौशल सिलावट ने अदालत में आरोप लगाया था कि घटना के बाद उन्होंने गाडरवारा थाने में शिकायत करने की कोशिश की, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की गई।
उनका दावा था कि इसके बाद उन्होंने नरसिंहपुर पुलिस अधीक्षक को भी कई बार लिखित शिकायतें भेजीं, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। परिवादी के अनुसार पंजीकृत डाक से थाना प्रभारी गाडरवारा को शिकायत भेजी गई, जिसे कथित तौर पर स्वीकार नहीं किया गया।
परिवादी ने इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) के फैसले का हवाला दिया था। उनका तर्क था कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस को एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
मार्च में अदालत के नोटिस के समय भी इन दावों और पेश किए गए दस्तावेजों का उल्लेख रिपोर्टों में किया गया था।
अब मामले की स्थिति क्या है?
16 सितंबर के आदेश के बाद इस परिवाद में फिलहाल मंत्री राव उदय प्रताप सिंह के खिलाफ आगे आपराधिक कार्रवाई का रास्ता इस अदालत में बंद हो गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने परिवाद को साक्ष्यों की अपर्याप्तता के आधार पर खारिज किया है; इसे आरोप सही या गलत साबित होने के अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
यह मामला 2024 की तिरंगा यात्रा से जुड़ा था और मार्च 2026 में नोटिस जारी होने के बाद इसकी सुनवाई आगे बढ़ी थी। अब 16 सितंबर को अदालत के आदेश के साथ इस परिवाद पर मौजूदा न्यायिक कार्यवाही समाप्त हुई है।





