प्लॉट के पैसे लौटे तो शांत हुईं IAS मैडम : दूसरों को बंगले खाली कराने वाले SP साहब अब खुद बचाने में जुटे : कमिश्नर साहब के नाम पर अफसर कर रहा वसूली

प्लॉट के पैसे लौटे तो शांत हुईं IAS मैडम : दूसरों को बंगले खाली कराने वाले SP साहब अब खुद बचाने में जुटे : कमिश्नर साहब के नाम पर अफसर कर रहा वसूली

1. प्लॉट के पैसे लौटे तो शांत हुईं IAS मैडम

राजधानी में करीब 50 IAS, IPS और IRS अफसरों ने मिलकर जमीन खरीदी थी। इरादा था अपनी बिरादरी के लिए एक शानदार कॉलोनी बसाने का, लेकिन जमीन पर प्लॉट कटने के बाद भी विकास की गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाई। सड़क, बिजली और दूसरी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार लंबा होता गया। नतीजा यह कि अफसरों की अपनी कॉलोनी ही विकास की बाट जोहती रह गई। इस सबसे सबसे ज्यादा परेशान थीं एक युवा IAS मैडम। मैडम को जब भी मौका मिलता, अफसरों के WhatsApp ग्रुप में अपनी नाराजगी जाहिर कर देतीं। कभी कॉलोनी के विकास को लेकर सवाल उठते, तो कभी अपनी ही बिरादरी के बड़े अफसरों को खरी-खोटी सुननी पड़ती। बात यहीं तक सीमित नहीं थी, मैडम अपने लगाए हुए रुपये वापस मांगने में भी पीछे नहीं रहती थीं। आखिरकार रोज-रोज के विवाद से तंग आकर एक रिटायर्ड IPS ने बीच का रास्ता निकाल लिया। उन्होंने मैडम का प्लॉट खरीद लिया और उनकी लगाई रकम लौटा दी। इसके बाद मैडम की नाराजगी भी दूर हो गई और अफसरों के WhatsApp ग्रुप में होने वाली तकरार पर भी विराम लग गया। अब न मैडम की रोज-रोज की शिकायतें और न ग्रुप में बहस का शोर। यानी न प्लॉट का झंझट, न रुपये फंसने की चिंता और न WhatsApp पर महाभारत!

2. दूसरों को बंगले खाली कराने वाले SP साहब अब खुद बचाने में जुटे

प्रमोशन पाकर आईपीएस बने एक साहब इन दिनों सरकारी बंगले को लेकर परेशान बताए जा रहे हैं। फिलहाल एक बड़े शहर के ग्रामीण इलाके में SP की जिम्मेदारी संभाल रहे साहब को अब अपना सरकारी आवास बचाने के लिए इधर-उधर गुहार लगानी पड़ रही है। दिलचस्प बात यह है कि कभी दूसरों को बंगले खाली कराने के लिए नोटिस थमाने वाले साहब अब खुद इसी कार्रवाई की जद में आ गए हैं। दरअसल, बड़े शहर में एक ऐसे संस्थान में पदस्थापना के दौरान, जिसे पुलिस महकमे में लूप लाइन माना जाता है, साहब ने संस्थान परिसर के बंगलों में रह रहे सीधी भर्ती और प्रमोटी IPS अफसरों को खूब परेशान किया था। किसी को बंगला खाली करने का नोटिस मिला तो किसी पर हजारों रुपये की रिकवरी निकाल दी गई। उस समय साहब नियम-कायदों को लेकर काफी सख्त बताए जाते थे। लेकिन वक्त ने ऐसी पलटी मारी कि साहब खुद SP बनकर दूसरी जगह पहुंच गए, फिर भी सरकारी बंगला खाली नहीं किया। अब जब बंगला खाली करने और रिकवरी के नोटिस मिलने लगे हैं, तो साहब को अपनी ही पुरानी कार्रवाई याद आ रही होगी। फिलहाल साहब अपने लिए राहत का रास्ता तलाश रहे हैं। देखना यह है कि नियमों की दुहाई देकर दूसरों से बंगले खाली कराने वाले साहब को अब खुद कितनी राहत मिलती है। दूसरों के लिए नियम सख्त थे साहब लेकिन अब वही नियम अपने दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।

3. कमिश्नर साहब के नाम पर अफसर कर रहा वसूली

बड़ी मुश्किल से एक प्रमोटी IAS को बड़े संभाग की कमान मिली है, लेकिन संभागीय कार्यालय से उठती वसूली की शिकायतों ने साहब की मुश्किलें बढ़ाने के आसार पैदा कर दिए हैं। संभाग में राजस्व के मामले पहले से ही बड़ी संख्या में लंबित हैं और अब फैसलों को लेकर कथित डीलिंग की कहानी भी चर्चा में आने लगी है। बताया जाता है कि कमिश्नर कार्यालय में पदस्थ डिप्टी कलेक्टर स्तर के एक अफसर की नजर उन मामलों पर रहती है, जिनमें कमिश्नर साहब को निर्णय लेना होता है। मामला समझते ही संबंधित पक्ष से संपर्क साधा जाता है और कथित तौर पर डीलिंग का रास्ता तलाशा जाता है। आरोप तो यहां तक हैं कि अब कुछ पक्षकार भी अपने मामलों में रास्ता निकालने के लिए सीधे इस अफसर तक पहुंचने लगे हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन अगर कमिश्नर कार्यालय में उनके नाम पर कोई खेल चल रहा है, तो इसकी जवाबदेही तय करना जरूरी है। साहब के लिए भी यह खतरे की घंटी है, क्योंकि प्रशासनिक गलियारों में ऐसी कहानी ज्यादा दिन तक दबती नहीं है। साहब को समय रहते इस कथित खेल पर लगाम लगानी होगी, वरना बड़े संभाग की कुर्सी संभालने का मौका कहीं फिर मंत्रालय वापसी की पटकथा न बन जाए।

4. टास्क में फेल हुए प्रमुख सचिव को विभाग छिनने की खुशी

सरकार कोई टास्क दे और अफसर उसे पूरा न कर पाए, तो आमतौर पर उसकी नींद उड़ जाती है। डर सताने लगता है कि कहीं सरकार नाराज होकर विभाग ही न छीन ले। लेकिन मंत्रालय में एक प्रमुख सचिव साहब की कहानी कुछ उलट है। सरकार ने उन्हें प्रदेश स्तर का एक बड़ा टास्क सौंपा था, लेकिन साहब उसमें बुरी तरह पिछड़ गए। हैरानी की बात यह है कि न तो साहब परेशान हैं और न ही उनके चेहरे पर कोई शिकन दिखाई दे रही है। आखिर टास्क पूरा न होने के बावजूद साहब खुश क्यों हैं? इसकी वजह उनके विभाग का गणित बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस विभाग में काम का बोझ तो भरपूर है, लेकिन साहब को इसमें अपने मतलब का कोई फायदा नजर नहीं आता। दिनभर फाइलें निपटाओ, बैठकों में माथापच्ची करो और लक्ष्य पूरा करने के लिए दौड़भाग अलग। यानी मेहनत बेहिसाब और दाम के नाम पर कुछ नहीं! अब साहब को उम्मीद है कि प्रदेश स्तरीय टास्क में नाकामी के बाद सरकार उनसे यह विभाग लेकर किसी दूसरे अफसर को सौंप सकती है। साहब की नजर में यह नुकसान नहीं, बल्कि एक तरह से छुटकारा होगा। आखिर उनके पास एक दूसरा महत्वपूर्ण विभाग भी है, जहां उनके हिसाब से कामकाज का गणित बेहतर बैठता है। अब देखना यह है कि सरकार साहब की उम्मीद पूरी करती है या उन्हें इसी विभाग में काम का बोझ उठाते रहने का फरमान सुनाती है। फिलहाल तो साहब के मन में यही चल रहा है कि टास्क पूरा नहीं हुआ तो क्या हुआ, शायद विभाग से छुटकारा ही मिल जाए!

5. सरकार ने आईएएस मैडम को दिया करारा झटका

मंत्रालय में सचिव स्तर की एक युवा IAS मैडम के तबादला प्रस्ताव का पूरा गणित ही पलट गया। मैडम ने अफसरों की तबादला सूची अनुमोदन के लिए सरकार के पास भेजी थी, लेकिन इसी बीच कथित लेनदेन को लेकर शिकायत पांचवें फ्लोर तक पहुंच गई। शिकायत के साथ एक सीडी होने की बात भी सामने आई, जिसमें कथित तौर पर मैडम के नाम का जिक्र बताया जा रहा है। मामला ऊपर तक पहुंचा तो सरकार ने पहले मैडम के बॉस को जांच की जिम्मेदारी सौंपी और तबादला सूची पर भी रोक लगा दी। इसके बाद जब सूची नए सिरे से तैयार हुई, तो उसमें पदस्थापना का पूरा गणित बदल गया। जिन अफसरों के नाम और जिन जिलों में उनकी पोस्टिंग तय मानी जा रही थी, नई सूची में उनके समीकरण ही बदल गए। अब दिलचस्प मोड़ यह है कि सूची में बदलाव से प्रभावित अफसरों को अपनी पसंद की पदस्थापना के लिए फिर से मशक्कत करनी पड़ सकती है। ऐसे में मैडम के दफ्तर के चक्कर बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, कथित लेनदेन और सीडी से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। लेकिन मंत्रालय में इस पूरे घटनाक्रम ने तबादलों के खेल को लेकर नए सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। मैडम के लिए अब चुनौती सिर्फ बदली हुई सूची नहीं, बल्कि शिकायत की जांच और उसके बाद उठने वाले सवाल भी हैं।

6. हटाए गए SP साहब की रात की महफिल में सीनियर अफसरों पर नाराजगी

रातों-रात जिले से हटाकर मुख्यालय अटैच किए गए SP साहब की नाराजगी अब अपने ही सीनियर अफसरों पर फूट रही है। शुरुआत में कहानी यह सामने आई कि किसानों द्वारा मुख्यमंत्री का काफिला रोके जाने के कारण साहब पर गाज गिरी, लेकिन बाद में उनके हटने की वजह कुछ और ही बताई जाने लगी। आरोपों के मुताबिक, महिला अधिकारी-कर्मचारियों पर भद्दे और दोहरे अर्थ वाले कमेंट करना साहब को भारी पड़ गया। अब जिले की कप्तानी छिनने का दर्द साहब को कुछ ज्यादा ही सता रहा है। बताया जाता है कि रात की महफिल जमती है, सुरा का दौर चलता है और सीनियर अफसरों के फैसलों पर नाराजगी जाहिर की जाती है। इस दौरान साहब के कुछ खास और करीबी अफसर भी मौजूद रहते हैं, जो उनकी बातें सुनते हैं और दुख-दर्द के साझेदार बनते हैं। कभी जिले की कमान संभालने वाले साहब अब अपनी ही व्यवस्था से खफा नजर आ रहे हैं। हालांकि, रात की महफिल में सीनियर अफसरों को सुनाई जा रही खरी-खोटी का उन तक क्या असर पहुंचता है, यह अलग कहानी है।

7. कलेक्टर मैडम के फार्महाउस पर ट्रांसफॉर्मर लगाने की जुगत

छोटे जिले की कमान संभाल रहीं एक प्रमोटी आईएएस मैडम इन दिनों राजधानी स्थित अपने फार्महाउस पर ट्रांसफॉर्मर लगवाने की कोशिश में बताई जा रही हैं। राजधानी के उस इलाके में मैडम का फार्महाउस है, जहां फार्महाउस की भरमार है। अब वहां बिजली की व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए ट्रांसफॉर्मर की जरूरत आन पड़ी है। बताया जाता है कि मैडम ने इसके लिए अपने जिले में पदस्थ बिजली विभाग के एक अधिकारी को निर्देश दिए कि राजधानी में किसी ठेकेदार के जरिए ट्रांसफॉर्मर लगवाने की व्यवस्था की जाए। आरोप यह भी हैं कि इसके लिए सरकारी प्रक्रिया का सहारा लेने की कोशिश की जा रही है, ताकि मैडम के फार्महाउस पर ट्रांसफॉर्मर लगाने का खर्च निजी जेब से न करना पड़े। हालांकि, फिलहाल ट्रांसफॉर्मर लगाने की कवायद आगे नहीं बढ़ पाई है। अब देखना यह है कि मैडम की यह कोशिश परवान चढ़ती है या मामला सरकारी फाइलों में ही अटककर रह जाता है। फार्महाउस निजी है तो बिजली का इंतजाम भी निजी खर्च से होगा या सरकारी व्यवस्था से मैडम का काम बनेगा? यही इस गॉसिप का असली सवाल है। यह वही कलेक्टर मैडम जिनसे इनके जिले के सारे जनप्रतिनिधि नाराज चल रहे हैं और लगातार इन्हें जिले से हटवाने के लिए सरकार से गुहार लगा रहे हैं। जबकि इन्हें पदस्थ हुए कुछ ही महीने बीते हैं।

8. आबो-हवा सुधारने वाले विभाग में फिर शुरू हुई कुश्ती

आबो-हवा सुधारने की जिम्मेदारी संभालने वाला विभाग एक बार फिर अंदरूनी खींचतान के चलते अखाड़ा बनने की राह पर है। इस बार मुकाबला विभाग के मुखिया एसीएस और उनके अधीन आने वाले संस्थान के अध्यक्ष के बीच छिड़ा है। दिलचस्प बात यह है कि अध्यक्ष जी खुद रिटायर्ड आईएएस हैं और अब सत्ताधारी दल से जुड़ चुके हैं। इसके बावजूद विभाग में उनकी राह आसान होती नजर नहीं आ रही। बताया जाता है कि एसीएस साहब ने अध्यक्ष जी के पूरे स्टाफ को उनकी जानकारी के बिना ही बदल दिया। अब अध्यक्ष जी का पारा चढ़ना स्वाभाविक था। उन्होंने भी देर नहीं की और सरकार को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी। पत्र में अध्यक्ष जी ने आरोप लगाया है कि उनका स्टाफ हटाकर उन्हें काम करने से रोकने की कोशिश की जा रही है। उनका यह भी कहना है कि स्टाफ में बदलाव के चलते कामकाज प्रभावित हो रहा है और फाइलें लंबित होती जा रही हैं। लेकिन अध्यक्ष जी की शिकायत पर अब तक कोई ठोस सुनवाई नहीं होने से उनकी नाराजगी और बढ़ गई है। अब सवाल यह है कि जिस विभाग की जिम्मेदारी आबो-हवा सुधारने की है, वहां अफसरों के बीच बिगड़े रिश्तों की हवा कौन सुधारेगा? अध्यक्ष जी सरकार तक अपनी बात पहुंचा चुके हैं, लेकिन गेंद अब सरकार के पाले में है। विभाग में प्रदूषण कम करने से पहले कुर्सियों के बीच बढ़ता टकराव कम करना जरूरी हो गया है।

9. रिटायर्ड आईएएस की हत्या से सहमे अफसरों में सुरक्षा पर छिड़ी बहस

राजधानी में एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी की हत्या के बाद अफसरों की बिरादरी में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। आईएएस एसोसिएशन के आधिकारिक व्हाट्सएप समूह पर इस मामले को लेकर लंबी बहस छिड़ी हुई है। सेवानिवृत्त अफसर अपनी ओर से सलाह और सुझाव दे रहे हैं, लेकिन मौजूदा आईएएस अधिकारियों की चुप्पी ने चर्चा को एक अलग ही मोड़ दे दिया। बताया जाता है कि जब मौजूदा अफसरों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, तो एक सेवानिवृत्त महिला आईएएस अधिकारी नाराज हो गईं। उन्होंने समूह में लिख दिया कि मौजूदा अफसरों को शायद अभी यह समझ नहीं आएगा कि घरेलू नौकरों से जुड़ा सुरक्षा का मामला कितना संवेदनशील हो सकता है। मैडम की दलील थी कि मौजूदा आईएएस अधिकारियों के बंगलों पर बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी काम करते हैं, जबकि निजी तौर पर रखे गए घरेलू सहायकों से जुड़े सुरक्षा पहलुओं पर अलग से ध्यान देने की जरूरत है। उनका इशारा इसी ओर था कि घर में काम करने वालों की पृष्ठभूमि और सत्यापन जैसे मुद्दों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। अब समूह में सवाल सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था का नहीं, बल्कि मौजूदा और सेवानिवृत्त अफसरों के नजरिए के अंतर का भी बन गया है। एक तरफ सेवानिवृत्त अफसर अपनी चिंता खुलकर जाहिर कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ मौजूदा अफसरों की खामोशी चर्चा का विषय बनी हुई है। हत्या ने सुरक्षा पर सवाल खड़े किए और समूह की खामोशी ने अफसरों के बीच नई बहस छेड़ दी।

10. बिजली कटौती ने रिटायर्ड आईएएस का पारा चढ़ाया, ग्रुप में लगाई अफसरों की क्लास

राजधानी में बिजली कटौती से आम आदमी परेशान हो तो समझ आता है, लेकिन जब इसकी मार रिटायर्ड आईएएस साहब पर पड़ने लगे तो मामला सीधे आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन के व्हाट्सएप समूह तक पहुंच गया। लंबे समय तक बिजली गुल रहने से परेशान साहब का सब्र आखिरकार जवाब दे गया। उन्होंने समूह में साफ लिख दिया कि अघोषित बिजली कटौती अब बड़ी समस्या बन चुकी है। जब राजधानी में ही इतने लंबे समय तक बिजली गुल रहती है, तो प्रदेश के बाकी इलाकों का क्या हाल होगा? साहब की शिकायत पर बिजली विभाग के मुखिया ने जवाब तो दिया, लेकिन ऐसा कि मानो गेंद सीधे जूनियर अफसर के पाले में डाल दी हो। उन्होंने लिखा कि उनका कोई कनिष्ठ अधिकारी साहब से संपर्क कर लेगा। यानी शिकायत बड़ी, परेशानी गंभीर, लेकिन समाधान का जिम्मा किसी जूनियर के हवाले! हालांकि, एक अन्य अपर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी ने मामले की गंभीरता समझते हुए विस्तार से स्थिति स्पष्ट की और बातचीत को संभालने की कोशिश की। अब बिजली कटौती से परेशान साहब को राहत कब मिलती है, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात जरूर दिखा दी—बिजली गुल होने पर अंधेरा घर में ही नहीं, कभी-कभी सरकारी जवाबों में भी नजर आने लगता है!

Abhishek Dubey

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Managing Editor

A journalist with more than 15 years of experience in investigative reporting

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